मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआइआर की कवायद को शुरू हुए एक साल पूरा हो गया है। वर्तमान में उन्नीस राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में यह प्रक्रिया जारी है। खबरों के मुताबिक, इसके जरिए अब तक करीब छह करोड़ मतदाताओं के नाम सूची से हटाए जा चुके हैं। ऐसे में यह सवाल अहम है कि क्या वास्तव में इतनी बड़ी संख्या में लोग मतदान करने के पात्र नहीं है? या फिर बहुत से लोग आधिकारिक दस्तावेज नहीं जुटा पाने की वजह से अपनी योग्यता साबित नहीं कर पाए? सबसे बड़ी चिंता की बात यह है कि जिन लोगों के नाम सूची से बाहर किए गए हैं, उनका भविष्य क्या होगा।
अगर वे मतदान के हकदार नहीं है, तो उनके दूसरे अधिकारों पर इसका क्या असर पड़ेगा? यह सवाल इसलिए महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि पश्चिम बंगाल और बिहार में पिछले दिनों हुए विधानसभा चुनावों के बाद ऐसी खबरें आई हैं कि दोनों राज्यों में संशोधित मतदाता सूची के आंकड़ों को अब सामाजिक सुरक्षा से जुड़ी सरकारी योजनाओं में शामिल किया जाएगा। इससे यह आशंका भी गहरा रही है कि मतदाता सूची से हटाए गए लोगों को अब सरकारी योजनाओं की लाभार्थी सूची से भी बाहर किया जा सकता है।
सबसे पहले बिहार में पिछले वर्ष विधानसभा चुनावों से पूर्व एसआइआर की प्रक्रिया शुरू की गई थी। तब विपक्षी दलों ने इसके समय को लेकर सवाल उठाए थे। उनका कहना था कि मतदाता सूची में संशोधन के लिए निर्वाचन आयोग के पास पहले पर्याप्त समय था, इसके बावजूद चुनावों से ठीक पहले इस प्रक्रिया को शुरू करना उचित नहीं है। इसके बाद नागरिकता के प्रमाण को लेकर भी यह प्रक्रिया विवादों में रही।
विवाद का यह सिलसिला केवल बिहार तक ही सीमित नहीं रहा, बल्कि उत्तर प्रदेश होते हुए यह पश्चिम बंगाल तक पहुंच गया। बिहार में इस प्रक्रिया के तहत मतदाता सूची से लगभग पैंसठ लाख नाम हटाए गए। दूसरे चरण में उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, राजस्थान, छत्तीसगढ़, केरल, पुडुचेरी, अंडमान और निकोबार द्वीप समूह, लक्षद्वीप, गुजरात, मध्य प्रदेश और गोवा में करीब 10.2 फीसद मतदाताओं को सूची से बाहर किया गया। सवाल यह भी है कि क्या इन लोगों को अपनी पात्रता साबित करने के लिए आगे कोई मौका दिया जाएगा, या फिर वे हमेशा के लिए मताधिकार से वंचित हो गए हैं।
इसमें कोई संदेह नहीं है कि मतदाता सूची का समय-समय पर संशोधन जरूरी है, ताकि जिनकी मृत्यु हो गई है या जिन्होंने फर्जी दस्तावेज के आधार पर अपना पंजीकरण कराया है, उनके नाम सूची से हटा दिए जाएं। मगर यह चिंताजनक है कि अभी कुछ राज्यों में ही एसआइआर की प्रक्रिया पूरी हुई है और करीब छह करोड़ लोग मताधिकार से वंचित हो गए हैं, तो देश भर में ऐसे लोगों की संख्या कितनी हो जाएगी, इसका अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं है।
सूची से बाहर किए गए लोगों को अब अपनी नागरिकता की चिंता भी सताने लगी है, क्योंकि उन्हें सरकार की कल्याणकारी योजनाओं की लाभार्थी सूची से भी बाहर होने का खतरा है। ऐसे में उनका भविष्य संकट में पड़ सकता है। यह सुनिश्चित करना निर्वाचन आयोग की जिम्मेदारी है कि कोई पात्र व्यक्ति किसी तकनीकी कारण या समय पर दस्तावेज न जुटा पाने की वजह से मताधिकार से वंचित न रह जाए। याद रखना चाहिए कि लोकतंत्र सही मायने में तभी जिंदा रहता है, जब पात्र नागरिकों के मतदान का अधिकार सुरक्षित रहे और चुनाव निष्पक्ष एवं पारदर्शी तरीके से संपन्न हों।
इसे विडंबना ही कहा जाएगा कि वर्तमान समय में जहां छोटे-छोटे कार्य आधुनिक उपकरणों की मदद से किए जा रहे हैं, वहीं जोखिम भरे साफ-सफाई के काम आज भी परंपरागत तरीके से ही हो रहे हैं। नतीजा यह कि सेप्टिक टैंक और सीवर की सफाई के दौरान जान जाने की घटनाएं आम हो गई हैं। राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली के मुंडका इलाके में बीते शुक्रवार को एक ऐसी ही घटना सामने आई, जहां एक कारखाने के सेप्टिक टैंक की सफाई करते वक्त जहरीली गैस की चपेट में आने से तीन श्रमिकों की मौत हो गई है। पढ़ें पूरी खबर।
