आंकड़ों पर सवाल

अगर सरकार संसद में सवालों से बचने का प्रयास करती है, तो उसका सीधा अर्थ यही होता है कि वह अपनी जवाबदेही से बच रही है।

अपनी मांगों को लेकर प्रदर्शन करते किसान। फाइल फोटो।

अगर सरकार संसद में सवालों से बचने का प्रयास करती है, तो उसका सीधा अर्थ यही होता है कि वह अपनी जवाबदेही से बच रही है। हालांकि कई बार सरकार के लिए कुछ सवालों के ठीक-ठीक जवाब देना मुश्किल होता है, पर उसके लिए वह समय लेकर जवाब देने का भरोसा दिला सकती है। पर केंद्र सरकार आंदोलन के दौरान हुई किसानों की मौत के आंकड़ों को लेकर साफ बचने का प्रयास करती देखी जा रही है।

एक सवाल के जवाब में संसद में कृषिमंत्री ने कहा कि सरकार के पास किसानों की मौत के आंकड़े नहीं हैं, इसलिए उन्हें मुआवजा देने संबंधी मांग पर विचार करना संभव नहीं है। हो सकता है, उनकी बात में सच्चाई हो, क्योंकि केंद्र तक आंकड़ों के पहुंचने की एक प्रक्रिया होती है। संभव है उस तक ये आंकड़े न पहुंचे हों। पर यह इतना जटिल काम नहीं है कि इसे सुलझाया न जा सके। यह पहली बार नहीं है, जब सरकार ने आंकड़ों को लेकर इस तरह इनकार की मुद्रा अपनाई है। कोविड के मामले में भी जब पूछा गया था कि आक्सीजन की कमी की वजह से कितनी मौतें हुर्इं, तब सरकार ने यही कहा था कि उसके पास इसके आंकड़े मौजूद नहीं हैं।

हालांकि किसान आंदोलन में हुई किसानों की मौत को लेकर संसद में पहली बार सवाल नहीं पूछा गया है। इससे पहले बजट सत्र और फिर मानसून सत्र में भी यही सवाल पूछा गया था। तब दोनों बार सरकार के बयान में अंतर दिखाई दिया था। कृषि राज्यमंत्री ने आंकड़े उपलब्ध न होने की बात कही थी, पर कृषिमंत्री ने उस दौरान हुई कुछ मौतों को स्वीकार किया था। अब वे खुद कह रहे हैं कि इससे संबंधी कोई आंकड़ा मौजूद नहीं है। स्वाभाविक ही, इस पर सरकार को फजीहत झेलनी पड़ रही है। दरअसल, किसानों की मांग है कि जब तक आंदोलन के दौरान जान गंवाने वाले किसानों के परिजनों को उचित मुआवजा नहीं दिया जाता, तब तक वे आंदोलन वापस नहीं लेंगे।

इसी पर सरकार ने मुद्दे से कन्नी काटने का प्रयास किया। पर पहली नजर में ही सरकार का यह तर्क इतना लचर है कि उस पर यकीन करना मुश्किल है। दूसरी तरफ किसान नेता मृतक किसानों की पूरी सूची सौंपने को तैयार हैं। हालांकि किसान नेताओं की सूची को सरकार वास्तविक आंकड़े के रूप में स्वीकार नहीं कर सकती। मगर पंजाब और हरियाणा सरकारों के पास भी इसके आंकड़े हैं, उनसे मांगा जा सकता था। उत्तर प्रदेश और दूसरी राज्य सरकारों से भी इसके आंकड़े मांगे जा सकते थे।

केंद्र के आंकड़े न होने के तर्क से तो यही जाहिर होता है कि वह किसानों को मुआवजा देने के पक्ष में ही नहीं है। हालांकि पंजाब सरकार अपने यहां के मृतक किसानों के परिजनों को मुआवजा और उनके परिवार के एक सदस्य को नौकरी तक दे चुकी है। हरियाणा में भी जब पुलिस के लाठी चलाने से हुई एक किसान की मौत पर हंगामा हुआ तो वहां की सरकार ने उसके परिवार को मुआवजा और एक सदस्य को नौकरी दी। किसान केंद्र सरकार से भी कुछ वैसा ही चाहते हैं। सरकार के पास अगर आंकड़े नहीं हैं, तो वह राज्यों से आंकड़े प्राप्त करके मुआवजे आदि के बारे में विचार करने का भरोसा तो दिला ही सकती थी। मगर वैसा न करके उसने इस मसले को जड़ से ही खत्म करने का प्रयास किया और किरकिरी झेलने का इंतजाम कर लिया।

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