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संपादकीय: दागी नुमाइंदे

आज भी अमूमन हर विधानसभा और संसद के आम चुनावों के बाद चुने गए जनप्रतिनिधियों की पृष्ठभूमि का अध्ययन और विश्लेषण करने पर निराशा हाथ लगती है। मसलन, हाल ही में संपन्न हुआ बिहार विधानसभा चुनाव देश में चर्चा का विषय रहा। लेकिन परिणामों के बाद न केवल जनप्रतिनिधियों के स्तर पर, बल्कि सरकार गठन तक के मामले में जिस तरह अपराध की छाया दिखी, वह हैरान करने वाली है।

Criminal politican nexusराजनीति का अपराधीकरण। सांकेतिक फोटो।

राजनीति को आपराधिक छवि के लोगों या दागियों से मुक्त कराने के लिए लंबे समय से सवाल उठाए जाते रहे हैं। इस मसले पर अपनी अध्ययन रिपोर्ट में कई संस्थाएं चुनाव लड़ने और जीतने वाले लोगों की पृष्ठभूमि का विश्लेषण कर बताते रहे हैं कि इस समूची प्रवृत्ति का राजनीति और जनता के हितों पर क्या असर पड़ सकता है। राजनीति के अपराधीकरण की आंच आए दिन न केवल जनप्रतिधिनियों के आचरण पर दिखती रही है, बल्कि आम लोगों के सरोकारों से संबंधित मसलों पर इसका नकारात्मक असर भी सबके सामने रहा है। अदालतों ने भी अपने स्तर पर ऐसे लोगों पर लगाम लगाने की कोशिश की है।

इसके बावजूद आज भी अमूमन हर विधानसभा और संसद के आम चुनावों के बाद चुने गए जनप्रतिनिधियों की पृष्ठभूमि का अध्ययन और विश्लेषण करने पर निराशा हाथ लगती है। मसलन, हाल ही में संपन्न हुआ बिहार विधानसभा चुनाव देश में चर्चा का विषय रहा। लेकिन परिणामों के बाद न केवल जनप्रतिनिधियों के स्तर पर, बल्कि सरकार गठन तक के मामले में जिस तरह अपराध की छाया दिखी, वह हैरान करने वाली है।

गौरतलब है कि बिहार इलेक्शन वाच और एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स यानी एडीआर के ताजा अध्ययन के मुताबिक कुल दो सौ तैंतालीस सदस्यों वाले बिहार विधानसभा के लिए नए चुने गए विधायकों में से एक सौ बयालीस आपराधिक पृष्ठभूमि के हैं। इनमें से नब्बे यानी चालीस फीसद पर हत्या, हत्या के प्रयास, सांप्रदायिक वैमनस्य फैलाने, अपहरण, महिलाओं के खिलाफ अपराध जैसे संगीन मामले दर्ज हैं।

सत्तर विधायकों पर आरोप तय किए जा चुके हैं। क्या ऐसी ही तस्वीर के बूते राजनीति को दागियों से मुक्त करने की उम्मीद की जा रही है? ऐसा नहीं है कि इस छवि या पृष्ठभूमि के विधायक किसी एक दल से हैं। ज्यादातर पार्टियों ने जिस तरह आपराधिक छवि के लोगों को अपना टिकट दिया, उससे साफ है कि ऊपरी तौर पर राजनीति में अपराधियों के बोलबाले पर विरोध जताने वाले नेता और उनकी पार्टियां वास्तव में कितना इसके विरुद्ध हैं।

आमतौर पर सभी दल अपनी सुविधा मुताबिक ऐसे लोगों को उम्मीदवार बना देते हैं, जो राजनीति के अपराधीकरण के लिए जिम्मेदार होते हैं। फिर ऐसे लोग जब चुन कर विधायिका या सरकार में जगह भी पा जाते हैं तो निश्चित रूप से उनका असर सरकार के कामकाज की शैली से लेकर नीतियों तक पर पड़ता है और जनता लाचार देखती रहती है।

इस बढ़ती समस्या यानी राजनीति और सरकार में अपराधियों के बढ़ते दबदबे के लिए अक्सर राजनीतिक विश्लेषकों की ओर से जनता को भी कठघरे में खड़ा किया जाता रहा है। सही है कि जनता को अपने विवेक का उपयोग कर आपराधिक छवि वाले लोगों को वोट नहीं देना चाहिए। लेकिन सवाल है कि जो आम मतदाता मुद्दों के आधार पर सरकार हटाना या बनाना चाहते हैं, वे उन स्थितियों में क्या करें जब उनके सामने विचारधारा आधारित समर्थन के क्रम में पार्टी के किसी वैसे उम्मीदवार को वोट देना मजबूरी हो, जो आपराधिक पृष्ठभूमि का होता है!

कभी-कभार अगर किसी खास विधायक या सांसद के अपराधों पर चर्चा तूल पकड़ने लगती है, तब सरकार को उसे हटाना पड़ता है। बिहार में नई सरकार के गठन के तीन दिन के भीतर शिक्षा मंत्री का पदभार संभालने के कुछ देर बाद मेवालाल चौधरी का इस्तीफा इसका उदाहरण है। मेवालाल चौधरी पर बिहार कृषि विश्वविद्यालय, भागलपुर में उपकुलपति रहते हुए सहायक प्राध्यापक और जूनियर वैज्ञानिक की नियुक्ति में अनियमितता बरतने के आरोप हैं। चुनाव प्रक्रिया को अपराध से मुक्त, स्वच्छ और स्वतंत्र तरीके संपन्न कराने का क्या हासिल, अगर आपराधिक पृष्ठभूमि के उम्मीदवार चुन कर कर विधानसभा, लोकसभा या सरकार में पहुंचते रहें!

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