नाकामी पर सवाल

अफगानिस्तान से अपने सैनिकों को हटा लेने के मुद्दे पर अमेरिका घिरता जा रहा है।

अमेरिकी राष्‍ट्रपति जो बाइडन। फाइल फोटो।

अफगानिस्तान से अपने सैनिकों को हटा लेने के मुद्दे पर अमेरिका घिरता जा रहा है। अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन सैनिकों की वापसी के फैसले को सही ठहराने पर भले अड़े रहें, पर अब उनकी सेना के बड़े अधिकारी ही उनके इस कदम से खुल कर असहमति जता रहे हैं। इससे पहले न सिर्फ दुनिया के कई देश बल्कि पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप सहित रिपब्लिकन नेता भी इस मुद्दे पर बाइडेन की आलोचना करते रहे हैं। हालांकि विरोधियों की आलोचना को फिर नजरअंदाज किया जा सकता है, पर जब सेना के शीर्ष स्तर से ऐसे स्वर सुनाई देने लगें कि अफगानिस्तान से सैनिकों की वापसी का फैसला रणनीतिक नाकामी साबित हुआ है, तो इसके गहरे अर्थ हैं। बहरहाल ऐसा कहने वाले बढ़ते जा रहे हैं कि बाइडेन का फैसला गलत रहा। साथ ही यह भी कहा जा रहा है कि सैनिकों की वापसी का फैसला पूरी तरह से राजनीतिक था। जबकि सेना के शीर्ष अधिकारी इस पक्ष में नहीं थे कि अमेरिकी सैनिकों को अभी वहां से बुला लिया जाए। वैसे भी अमेरिका का इतिहास यही रहा है कि चाहे वियतनाम हो या फिर इराक और अफगानिस्तान जैसे लंबे अभियान, हर जगह उसे ऐसी ही रणनीतिक नाकामी के आरोप झेलना पड़े हैं।

अमेरिकी सेना के ज्वाइंट चीफ आॅफ स्टाफ के प्रमुख जनरल मार्क मिले का सीनेट की सशस्त्र सेवा समिति के समक्ष यह कहना कि काबुल से सैनिकों की वापसी बड़ी रणनीतिक नाकामी है, अमेरिकी प्रशासन के समक्ष बड़े सवाल खड़े करता है। हालांकि मिले ने इसे अपनी निजी राय बताया। लेकिन इस मामले में उनकी राय का महत्त्व इसलिए बढ़ जाता है कि एक शीर्ष सैन्य अधिकारी के नाते अफगानिस्तान के हालात को वे कहीं ज्यादा बेहतर ढंग से समझते रहे हैं। और सिर्फ मिले ही नहीं, अफगानिस्तान में लंबे समय तक लड़ाई की कमान संभालने वाले जनरल फ्रैंच मैंकेजी ने भी मिले की राय से पूरी तरह सहमति जताई है। वैसे तो सेना का काम राष्ट्रपति के निदेर्शों का पालन करना होता है। पर इससे यह तो साफ हो ही गया कि सैनिकों की वापसी का बाइडेन का फैसला अदूरदर्शी था। इसलिए अगर आज दुनियाभर में यह कहा जा रहा है कि अमेरिका ने अफगानिस्तान को और बड़े संकट में झोंक डाला, तो इसमें गलत क्या है! इस हकीकत से कोई इंकार नहीं करेगा कि जो देश अलकायदा और तालिबान के खात्मे के लिए ही अफगानिस्तान आया था, वह उस मुल्क को तालिबान के हवाले करके बच निकला।

आज अफगानिस्तान गंभीर संकट में है। तालिबान पहले से ज्यादा ताकतवर दिख रहा है। बीस साल पहले उसे सिर्फ पाकिस्तान, सउदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात का ही समर्थन हासिल था। पर अब तो रूस, चीन जैसे देश भी तालिबान सरकार के साथ खुल कर खड़े हैं। इस समय पाकिस्तान की भूमिका कहीं ज्यादा निर्णायक लग रही है। गौर किया जाना चाहिए कि अफगानिस्तान की अंतरिम सरकार के गठन में उसकी बड़ी भूमिका रही है। इसलिए अब अमेरिकी जनरलों की ओर से जो सवाल उठ रहे हैं, उनका मतलब कमोबेश यही है कि बीस साल में अरबों-खरबों डॉलर फूंक डालने का हासिल क्या रहा। करीब ढाई हजार अमेरिकी सैनिक भी मारे गए। तालिबान का कुछ बिगड़ा नहीं। इसलिए अमेरिकी जनरलों की इस बात में दम लगता है कि अगर मौजूदा हालात में सैनिकों की वापसी नहीं होती तो अफगानिस्तान को तालिबान के हाथों में पड़ने से बचाया जा सकता था। बहरहाल दुनिया के सामने एक सबक जरूर बना है कि ताकतवर देश अपनी महत्त्वाकांक्षाओं की खातिर दूसरे मुल्कों को कैसे तबाह कर देते हैं।

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