इसमें कोई दोराय नहीं कि विधायिका में महिलाओं के प्रतिनिधित्व को बढ़ाने के लिए सरकार और सभी विपक्षी दलों को एक ईमानदार इच्छाशक्ति के साथ काम करना चाहिए। मगर यही मुद्दा जब राजनीतिक लाभ उठाने का जरिया बनने लगता है, तब इस पर सवाल उठने लगते हैं। बीते हफ्ते सरकार ने महिला आरक्षण से जुड़ा 131वां संशोधन विधेयक पेश किया, लेकिन जरूरी समर्थन न मिल पाने की वजह से वह लोकसभा में गिर गया।

गौरतलब है कि किसी भी संविधान संशोधन विधेयक को पारित कराने के लिए लोकसभा में दो-तिहाई बहुमत की जरूरत होती है, लेकिन तमाम कोशिशों के बावजूद सरकार जरूरी समर्थन हासिल नहीं कर सकी। हालांकि इस बार परिसीमन विधेयक में संशोधन के लिए जिस तरह महिला आरक्षण का मसला भी जुड़ा हुआ था, उसमें इस मुद्दे पर दो-तिहाई सांसदों को अपने पक्ष में खड़ा कर पाना सरकार के लिए मुश्किल था। यानी पहले ही यह माना जा रहा था कि लोकसभा में संशोधन विधेयक पारित कराना मुमकिन नहीं हो पाएगा। इसके बावजूद यह विचित्र है कि सरकार ने इस पर जोर-आजमाइश करने की कोशिश की।

दरअसल, इस संशोधन विधेयक का उद्देश्य यह बताया गया था कि इससे लोकसभा और विधानसभाओं में महिलाओं के लिए आरक्षण सुनिश्चित किया जा सकेगा। साथ ही, 2026 से पहले की जनगणना के आधार पर राज्यों में सीटों के परिसीमन की इजाजत दी जाएगी और लोकसभा में सीटों की संख्या 543 से बढ़ा कर 850 की जाएगी। मगर चूंकि परिसीमन के साथ उलझे इस मुद्दे पर सरकार को जरूरी संख्या बल का समर्थन नहीं मिल सका, इसलिए अब भाजपा विधानसभा चुनावों के प्रचार के दौरान यह आरोप लगाने की कोशिश कर सकती है कि विपक्षी पार्टियां महिलाओं को भागीदारी देने का समर्थन नहीं करतीं।

सवाल है कि महिलाओं की विधायिका में आरक्षण से संबंधित जो विधेयक वर्ष 2023 में ही पारित होकर संविधान का हिस्सा बन चुका था, उसे फिर से तब क्यों लाया गया, जब कुछ राज्यों में विधानसभा चुनाव की प्रक्रिया चल रही है। यह बेवजह नहीं है कि इस संशोधन विधेयक को लाए जाने के समय को लेकर सवाल उठाए जा रहे हैं।

ऐसा लगता है कि इस विधेयक की जटिलता और उसके पारित होने के सामने खड़ी चुनौतियों की तस्वीर चूंकि लगभग साफ थी, इसलिए इसे राज्यों में जारी चुनावी प्रक्रिया के बीच महिलाओं का समर्थन हासिल करने वाले एक अहम मुद्दे के रूप में भी देखा गया। शनिवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के देश के नाम संबोधन में भी यह साफ दिखा, जिसमें उन्होंने महिला आरक्षण से जुड़े इस संशोधन विधेयक के पारित न होने के लिए विपक्षी दलों को जिम्मेदार बताया।

मगर विधेयक में जिस तरह सरकार ने आरक्षण व्यवस्था को नए परिसीमन और लोकसभा के विस्तार के ढांचे से जोड़ कर पेश किया था, उसमें वह किस तरह के समर्थन की उम्मीद कर रही थी। महिला आरक्षण के प्रावधानों के साथ-साथ खासतौर पर परिसीमन के मुद्दे पर तमिलनाडु सहित दक्षिण भारत के राज्यों की जैसी प्रतिक्रिया थी, उसमें विपक्षी दलों के समर्थन या विरोध की तस्वीर एक तरह से पहले से साफ थी। अफसोस की बात है कि जहां विधायिका में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने की कवायद पर सबकी सहमति होनी चाहिए थी, वहीं यह सवालों के घेरे में उलझ कर रह गई। जबकि जरूरत इस बात की है कि इस मामले को राजनीति का मुद्दा बनाने के बजाय एक सर्वसम्मत रास्ता निकालने की कोशिश हो।