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संपादकीय: संवेदना की मिसाल

घर और काम से लाचार लोगों के सड़क पर पैदल चलते हुए भूख से जूझने के हालात की बस कल्पना ही की जा सकती है। त्रासद हालत को देख कर पुणे के ऑटो चालक ने अपने विवाह के लिए बचाए पैसे से सड़क पर मजदूरों को भोजन कराना शुरू कर दिया।

Author Published on: May 21, 2020 12:43 AM
पुणे के ऑटो-रिक्शा चालक अक्षय कोथावले ने पूर्णबंदी के दौरान अपने विवाह के पैसे से जरूरतमंदों को भोजन कराया। (फोटो सोर्स- PTI)

आधुनिकता की चकाचौंध में डूबे शहरों-महानगरों में आज के दौर में मानवीय व्यवहार में जैसा बदलाव देखा गया है, उसमें सबसे ज्यादा फिक्र इस बात को लेकर जताई जाती है कि लोगों के बीच आपसी सद्भाव और सहायता का भाव तेजी से कम हुआ है। अक्सर ऐसी घटनाएं सामने आती रहती हैं, जिनमें लोगों की उदासीनता या संवेदनहीनता की वजह से कोई घायल सड़क पर देर तक पड़ा रहा और समय पर इलाज न मिल पाने की वजह से उसकी मौत हो गई।

चूंकि अलग-अलग मामलों में ऐसी घटनाएं सामने आती रहती हैं, इसलिए एक आम धारणा यह बनी है कि लोग अब आत्मकेंद्रित होते जा रहे हैं और मानवीय संवेदनाओं के लिए जगह नहीं बची है। लेकिन हाल में कोरोना महामारी के प्रसार के खतरे को देखते हुए जब दुनिया भर के देशों की तरह भारत में भी पूर्णबंदी लागू की गई, तब अनेक ऐसी तस्वीरें सामने आर्इं, जिससे यह साफ हुआ है कि आज भी हमारे देश के आम लोग बेहद संवेदनशील हैं और अक्सर अपने अभाव को भूल कर या फिर कई बार तो अपने घर में बेहद दुख के माहौल में भी अपने भीतर मौजूद इंसानियत को नहीं भूलते हैं।

दरअसल, पुणे में एक आॅटो रिक्शा चलाने वाले तीस वर्षीय अक्षय कोथावले ने जैसा उदाहरण पेश किया है, उसे लंबे समय तक संवेदना की मिसाल के तौर पर देखा जाएगा। यह किसी से छिपा नहीं है कि पूर्णबंदी की वजह से सारे उद्योग-धंधे ठप होने के बाद शहरों में मजदूर तबकों की रोजी-रोटी से लेकर रहने का ठिकाना तक छिन गया और कर्फ्यू जैसी स्थिति में भी उन्हें सड़क पर आने को मजबूर होना पड़ा। अपने गांव जाने के लिए जब कोई वाहन नहीं मिला तो उन्होंने सड़क के रास्ते पैदल ही चलना शुरू कर दिया, लेकिन तमाम लोगों के सामने कुछ ही दिन में भूख एक बड़ी चुनौती बन कर खड़ी हो गई।

घर और काम से लाचार लोगों के सड़क पर पैदल चलते हुए भूख से जूझने के हालात की बस कल्पना ही की जा सकती है। इसी त्रासद हालत को देख कर पुणे के इस आॅटो चालक ने अपने विवाह के लिए बचाए पैसे से सड़क पर मजदूरों को भोजन कराना शुरू कर दिया। यही नहीं, इसी दौरान बीमारी से जब उसके पिता की मौत हो गई, तब भी उसने लाचार लोगों की मदद का काम बंद नहीं किया। यह अपने आप में अनूठा उदाहरण है।

खुद ही दुख में पड़े होने के बावजूद अपनी क्षमता भर मदद के लिए तैयार इस नौजवान की संवेदना को एक मिसाल के तौर पर देखा जा सकता है। ऐसे मददगार लोगों ने अपने सीमित संसाधनों में जगह-जगह जिस तरह भूख से दो-चार लोगों को भोजन मुहैया कराया, उससे न जाने के कितने लोगों की जान बच सकी।

सही है कि पूर्णबंदी से उपजे हालात में सरकार को मुख्य रूप से लाचारों की मदद करने का काम अपने हाथ में लेना चाहिए था। लेकिन लाचारगी की हालत में हजार-दो हजार किलोमीटर पैदल ही चल पड़े मजदूरों या गरीबों को रास्ते में अपने खर्च पर मदद करने वाले और भोजन मुहैया कराने वाले तमाम लोगों ने यह साबित किया है कि संकट के समय खुद को बचाना प्राथमिकता जरूर है, लेकिन हालात के मारे भूखे और लाचार लोगों की मदद करने की संवेदना अभी खत्म नहीं हुई है। संकट के आदर्श और नायक ऐसे मददगार लोग भी हैं।

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