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अवसर की राजनीति

लोक जनशक्ति पार्टी यानी लोजपा में टूट की ताजा घटना ने फिर एक बार यह साबित किया है कि राजनीति की दुनिया में बहुत कुछ महत्त्वाकांक्षाओं से संचालित होता है, लेकिन अक्सर उस पर सिद्धांत और सरोकार का पर्दा टांग दिया जाता है।

सांकेतिक फोटो।

लोक जनशक्ति पार्टी यानी लोजपा में टूट की ताजा घटना ने फिर एक बार यह साबित किया है कि राजनीति की दुनिया में बहुत कुछ महत्त्वाकांक्षाओं से संचालित होता है, लेकिन अक्सर उस पर सिद्धांत और सरोकार का पर्दा टांग दिया जाता है। बिहार में पिछले साल हुए विधानसभा चुनावों के दौरान जब चिराग पासवान के नेतृत्व में लोजपा ने राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन यानी राजग से अलग मैदान में उतरने का फैसला किया था, उसी समय कई बातें साफ थीं।

पहली नजर में यही माना गया कि लोजपा ने यह रुख दरअसल नीतीश कुमार के नेतृत्व वाले जदयू की ताकत को सीमित करने के लिए अपनाया था। हालांकि तमाम आकलनों के बीच चिराग पासवान खुद को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का समर्थक बताते रहे और कहते रहे कि वे राजग के साथ हैं, लेकिन चुनावी मैदान में उन्होंने भाजपा और जदयू गठबंधन के बरक्स एक सौ पैंतीस सीटों पर अपनी पार्टी के उम्मीदवार खड़े किए थे। नतीजे अनुमान के अनुरूप आए और उनकी पार्टी के महज एक उम्मीदवार को जीत मिली। मगर लोजपा उम्मीदवारों की वजह से करीब दो दर्जन सीटों पर जदयू को नुकसान पहुंचा। जाहिर है, यह नीतीश कुमार के लिए एक बड़ा झटका था, जिनका कद कम सीटें आने से कुछ कमजोर हुआ।

उस समूचे प्रसंग में पर्दे के पीछे यह खास बात दबी-ढकी रह गई कि बिहार विधानसभा चुनावों में अकेले लड़ने के चिराग पासवान के फैसले से खुद उनकी ही पार्टी के ज्यादातर नेता और खासतौर पर उनके अपने चाचा पशुपति कुमार पारस सहमत नहीं थे। असंतोष की आग तभी लग गई थी, जो अब जाकर अचानक भड़क गई दिख रही है। चिराग पासवान सहित पार्टी के छह में से पांच सांसदों ने पशुपति कुमार पारस के नेतृत्व में पार्टी को बचाने का नारा लगा कर अलग होने की घोषणा कर दी।

खबरों के मुताबिक लोजपा की इस टूट में जदयू की भी भूमिका रही है और समय का चुनाव केंद्र सरकार में मंत्रिमंडल में भावी विस्तार को ध्यान में रखते हुए किया गया है। अब देखना यह है कि पशुपति कुमार पारस के नेतृत्व में अलग हुआ धड़ा जदयू या भाजपा में विलय का रास्ता चुनता है या फिर स्वतंत्र रह कर राजग में अपने लिए जगह बनाता है। दूसरी ओर, चाचा पशुपति कुमार पारस को मनाने में नाकाम रहने के बाद एक तरह से चिराग पासवान फिलहाल न केवल राजनीति के मैदान में अकेले रह गए हैं, बल्कि परिवार भी टूट गया। हालांकि उन्हें बिहार में राजद के एक नेता की ओर से अनौपचारिक प्रस्ताव मिला है कि वे केंद्र की राजनीति करें और तेजस्वी यादव राज्य की। लेकिन चिराग का रुख अभी सामने नहीं आया है।

दरअसल, राजनीति की दुनिया में अनिश्चितताओं को एक खास चरित्र माना जाता रहा है। स्थिरता और निष्ठा के सबसे ज्यादा बढ़-चढ़ कर दावे करने वाले नेता कब किस पाले में खड़े दिख जाएं, कहा नहीं जा सकता। पिता रामविलास पासवान के निधन के बाद विरासत में मिली पार्टी को संभाल पाना चिराग पासवान के लिए संभव नहीं हो सका। उनके चाचा यानी पशुपति कुमार पारस को एक कुशल चुनाव प्रबंधक और संयोजक माना जाता है।

लेकिन यह भी ध्यान रखने की जरूरत है कि दिवंगत रामविलास पासवान की छवि एक व्यापक जनाधार वाले नेता की थी। भारतीय राजनीति में जमीनी स्तर पर जनता के बीच कद्दावर नेताओं की संतानों को लेकर जिस तरह भावनात्मक लगाव चुनावी समर्थन के एक प्रमुख कारक के रूप में काम करता रहा है, उसमें यह देखना होगा कि टूट के बाद रामविलास पासवान की छवि से जुड़ी लोजपा की समर्थक जनता चिराग पासवान और पशुपति कुमार पारस में से किसका पक्ष चुनती है।

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