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संपादकीयः पाक पर दबाव

नवंबर 2008 में मुंबई में हुए आतंकी हमले की बाबत अमेरिका ने उचित ही पाकिस्तान पर दबाव बढ़ाने की मंशा जताई है।

Author September 9, 2016 3:38 AM

नवंबर 2008 में मुंबई में हुए आतंकी हमले की बाबत अमेरिका ने उचित ही पाकिस्तान पर दबाव बढ़ाने की मंशा जताई है। इस हमले में छह अमेरिकियों समेत एक सौ छियासठ लोग मारे गए थे। अमेरिकी विदेश विभाग के प्रवक्ता मार्क टोनर ने दो दिन पहले वाशिंगटन में कहा कि उनका देश इस मामले में जवाबदेही और न्याय चाहता है। अमेरिकी विदेश विभाग इस आशय की बात पहले भी कई बार कह चुका है। इसे एक बार फिर दोहराने का औचित्य जाहिर है। मुंबई कांड को करीब आठ साल होने जा रहे हैं। लेकिन इस मामले की न्यायिक कार्यवाही तर्कसंगत परिणति तक नहीं पहुंच पाई है। इसकी क्या वजह हो सकती है? यह अदालती कार्यवाही की शिथिलता मात्र नहीं है। दरअसल, यह शुरू से ही बार-बार जाहिर होता रहा है कि इस मामले के प्रमुख दोषियों को सजा दिलाने में पाकिस्तान सरकार की या तो दिलचस्पी नहीं है या इसके लिए उसमें जरूरी राजनीतिक इच्छाशक्ति का अभाव है।

यही कारण है कि तमाम सबूतों के होते हुए भी पाकिस्तान सरकार जब-तब भारत से सबूतों की मांग करती आई है। अजमल कसाब एक जिंदा सबूत था, उसकी गवाही से बहुत सारे तथ्य सामने आ चुके थे। फिर डेविड हेडली ने अपनी गवाही में न सिर्फ मुंबई हमले की योजना पाकिस्तान में बनने की सारी कहानी बताई बल्कि यह भी बताया कि हमलावरों को किसने प्रशिक्षण दिया और आइएसआइ के कौन-से अफसर इस षड्यंत्र में शामिल थे। मुंबई कांड की विस्तृत जांच भारत ने तो की ही, अमेरिका की संघीय जांच एजेंसी ने भी की थी। और भारत के अलावा अमेरिका ने भी काफी सबूत पाकिस्तान को मुहैया कराए थे। लेकिन हमले के सूत्रधार लश्कर-ए-तैयबा के कमांडर जकीउर्रहमान लखवी को एक साल पहले जेल से जमानत पर रिहा कर दिया गया। पठानकोट मामले में तो पाकिस्तान ने भारत की ओर से सौंपे गए सबूतों को ही खारिज कर दिया। क्या अमेरिका का दबाव रंग लाएगा और मुंबई कांड के दोषियों को सजा सुनाई जाएगी?

पाकिस्तान जिस हद तक अमेरिका की मदद पर निर्भर है उसे देखते हुए अमेरिकी अपेक्षाओं की अनदेखी कर पाना उसके लिए संभव नहीं है। अलबत्ता बहुत कुछ इस पर निर्भर करेगा कि अमेरिका किस हद तक सख्ती दिखाता है। पाकिस्तान पर प्रतिबंध लगाए जाने की संभावना से अमेरिकी विदेश विभाग ने फिलहाल इनकार किया है। मुंबई कांड को लेकर न्याय और जवाबदेही सुनिश्चित करने की मांग के साथ-साथ अमेरिका का यह कहना भी बहुत मायने रखता है कि पाकिस्तान को सभी आतंकी समूहों के खिलाफ कार्रवाई करनी चाहिए और इसमें उन समूहों को भी शामिल किया जाना चाहिए जो उसके पड़ोसी देशों को निशाना बनाते हैं।

यह बात खासकर भारत के संदर्भ में लागू होती है क्योंकि पाकिस्तान की जमीन पर पल रहे और वहां से अपनी गतिविधियां संचालित कर रहे आतंकी समूहों के निशाने पर सबसे ज्यादा भारत ही रहा है, उसके बाद अफगानिस्तान। अफगानिस्तान में आतंकवाद से लड़ना अमेरिका की अफ-पाक नीति का हिस्सा रहा है। पर अमेरिका अगर भारत-विरोधी आतंकवाद पर भी उतना ही संजीदा रुख दिखाए तो पाकिस्तान का राज्यतंत्र ज्यादा दिन हीलाहवाली नहीं कर सकता। जिस समय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी आतंकवाद को लेकर अंतरराष्ट्रीय मंचों पर पाकिस्तान को लगातार घेरने की कोशिश में लगे हैं, उस समय अमेरिका की ओर से पाकिस्तान को लगभग चेताने वाला बयान भारत की

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