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अनुदान बनाम तस्वीर

इससे बड़ी विडंबना और क्या होगी कि किसी राज्य के नागरिकों को सिर्फ अपने मुख्यमंत्री की एक नाहक जिद की वजह से केंद्र की ओर से मिलने वाले कुछ अनुदानों से वंचित होना पड़े। केंद्र सरकार के सख्त संदेश और कैग की आपत्ति के बावजूद पंजाब के मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल ने जिस तरह आपातकालीन एंबुलेंस सेवा-108 पर से अपनी तस्वीर हटवाने से इनकार कर दिया है, वह हैरान करता है।

Author June 5, 2015 11:00 PM

इससे बड़ी विडंबना और क्या होगी कि किसी राज्य के नागरिकों को सिर्फ अपने मुख्यमंत्री की एक नाहक जिद की वजह से केंद्र की ओर से मिलने वाले कुछ अनुदानों से वंचित होना पड़े। केंद्र सरकार के सख्त संदेश और कैग की आपत्ति के बावजूद पंजाब के मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल ने जिस तरह आपातकालीन एंबुलेंस सेवा-108 पर से अपनी तस्वीर हटवाने से इनकार कर दिया है, वह हैरान करता है।

मुख्यमंत्री के लिए राज्य के संसाधनों से अपनी छवि का प्रचार ज्यादा जरूरी है या फिर जनता का हित! गौरतलब है कि पंजाब में दो सौ चालीस एंबुलेंसों पर प्रकाश सिंह बादल की तस्वीर को लेकर पिछले लगभग तीन साल से विवाद चला आ रहा है। और इसके चलते इस दौरान राज्य को करीब चौबीस करोड़ रुपए का अनुदान गंवाना पड़ा है। इस साल फिर केंद्र ने साफ कहा है कि अगर इन एंबुलेंसों पर से बादल की तस्वीर नहीं हटाई गई तो राज्य को राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन के तहत मिलने वाला केंद्रीय अनुदान नहीं मिल पाएगा।

संभव है कि इसे राज्य सरकार के कामकाज के तौर-तरीकों में केंद्र के हस्तक्षेप की तरह भी देखा जाए। लेकिन सवाल है कि मुख्यमंत्री की प्राथमिकता क्या है, एक स्वास्थ्य योजना पर अमल, या आत्म-प्रचार? यह अकेला मामला नहीं है जब राज्य सरकार ने किसी कल्याणकारी योजना को राजनीतिक प्रचार का जरिया बनाया हो। राशन कार्ड और सरकारी स्कूलों में निशुल्क दिए जाने वाले बस्तों पर मुख्यमंत्री की तस्वीर अंकित किए जाने के मामले भी चर्चा का विषय बने थे।

एंबुलेंस किसी मरीज को इलाज की खातिर लाने-पहुंचाने के लिए हैं। उन पर राज्य के मुख्यमंत्री की तस्वीर चस्पां करने का क्या औचित्य है? मगर वहां के लोग वक्त-बेवक्त ये चित्र देखने के लिए मजबूर कर दिए गए हैं। विचित्र है कि प्रकाश सिंह बादल की यह जिद तब भी कायम है जब हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि सरकारी विज्ञापनों में प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति के अलावा केवल भारत के मुख्य न्यायाधीश की तस्वीर रह सकती है।

किसी अहम मसले पर जरूरी जानकारी देने या जन-जागरूकता फैलाने के मकसद से कुछ विज्ञापनों को उचित कहा जा सकता है। मसलन, सरकार के जनकल्याण कार्यक्रमों या सड़क दुर्घटना रोकने के लिए एहतियाती उपाय बरतने, संक्रामक बीमारियों से बचाव के तरीके अपनाने आदि के बारे में बताने वाले विज्ञापनों से शायद ही किसी को एतराज हो। लेकिन अगर सत्ता में बैठे लोग हर जगह अपनी तस्वीर देखने का लोभ काबू में न रख पाएं तो ऐसे विज्ञापन भी आत्म-विज्ञापन का जरिया बन सकते हैं। पंजाब का मामला ऐसा ही है।

दूसरे राज्यों के भी ऐसे अनेक उदाहरण हैं जिनमें जनकल्याण से संबंधित किसी कार्यक्रम को वहां के मुख्यमंत्री ने अपने महिमामंडन का माध्यम बना लिया। उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी की सरकार ने अपने चुनावी वादे के तहत लैपटॉप बांटे। शिकायत आई थी कि लैपटॉप खोलते ही स्क्रीन पर मुलायम सिंह यादव और अखिलेश यादव की तस्वीर प्रकट हो जाती है।

करीब दो साल पहले गुजरात में स्कूली बस्तों पर वहां के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी की तस्वीर छाप दी गई थी। जब इस सब पर एतराज जताया जाता है तो सफाई दी जाती है कि लोगों के लिए सरकारी योजनाओं के बारे में जानना जरूरी है। लेकिन क्या जनता के बीच सरकारी योजनाओं की जानकारी पहुंचाना और उन पर अपनी छवि आरोपित करना एक ही बात है?

 

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