सत्ता की लड़ाई

अफगानिस्तान में राजनीतिक संकट दिनोंदिन गहराता जा रहा है। इस देश पर तालिबान के कब्जे को बीस दिन हो चुके हैं।

सांकेतिक फोटो।

अफगानिस्तान में राजनीतिक संकट दिनोंदिन गहराता जा रहा है। इस देश पर तालिबान के कब्जे को बीस दिन हो चुके हैं। पर अभी तक सरकार के गठन का रास्ता नहीं निकला है। पहले तो लग रहा था कि 31 अगस्त को अमेरिका के पूरी तरह से चले जाने के बाद तालिबान अपनी सरकार बना लेगा और भविष्य का रास्ता साफ होगा। पर तालिबान और दूसरे गुटों के सत्ता संघर्ष ने सरकार गठन की कोशिशों को और जटिल बना दिया है। ऐसी भी खबरें हैं कि सत्ता को लेकर तालिबान और हक्कानी नेटवर्क के लोगों में गोलीबारी भी हुई है।

अगर ऐसा है तो इससे इस बात का अंदाजा लगा पाना कोई मुश्किल नहीं होगा कि अफगानिस्तान की सत्ता को लेकर अब गुटीय संघर्ष कितने तेज होते जा रहे हैं! सत्ता के लिए मारकाट जैसे हालात भी देखने को मिलने लगें तो हैरानी नहीं होगी। गौरतलब है कि तालिबान मुल्ला बरादर को पहले ही देश का राष्ट्रपति घोषित कर चुका है। दरअसल अफगानिस्तान पर कब्जे के लिए कई महीनों तक चली लड़ाई अकेले तालिबान ने नहीं लड़ी, बल्कि इसमें आतंकी संगठनों भी बराबर की भूमिका रही है। इसलिए अब कोई भी सत्ता को हाथ से नहीं जाने देना चाहेगा।

इस बात के संकेत तो पहले से ही मिल रहे थे कि अबकी बार तालिबान के लिए सरकार बना पाना उतना आसान नहीं होगा, जितना आज से ढाई दशक पहले था। ऐसा इसलिए भी है कि इस बार अफगानिस्तान के घटनाक्रम में सबसे बड़ी भूमिका पाकिस्तान की रही है। यह तो जगजाहिर है कि अफगानिस्तान की अमेरिका समर्थित निर्वाचित सरकारों और अमेरिकी व गठबंधन सेना के खिलाफ जंग में पाकिस्तान तालिबान को हर तरह से मदद करता रहा। उसने तालिबान को हथियारों से लेकर लड़ाके तक दिए। पाकिस्तान ने तालिबान के पिछले शासन को भी मान्यता दी थी।

इसलिए अब अफगानिस्तान तालिबान की भी मजबूरी है कि अब उसी रास्ते पर चलेगा जिस पर पाकिस्तान उसे ले जाएगा। इसका ताजा सबूत दो दिन पहले पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी के प्रमुख की काबुल यात्रा है। इससे पाकिस्तान एक बार फिर बेनकाब हो गया है। पाकिस्तान किसी भी तरह से तालिबान सरकार में हक्कानी नेटवर्क की बड़ी भागीदारी चाह रहा है। इससे पाकिस्तान और हक्कानी नेटवर्क के प्रगाढ़ संबंधों की पुष्टि भी होती है। अफगानिस्तान के पूरब के सूबे हक्कानी नेटवर्क के कब्जे में हैं। जाहिर है, ऐसे में वह बराबर की सत्ता चाहेगा। गौरतलब है कि हक्कानी नेटवर्क को अमेरिका ने प्रतिबंधित आतंकी संगठन घोषित कर रखा है। इस संगठन पर कार्रवाई के लिए वह पाकिस्तान पर लगातार दबाव भी बना रहा है। पर पाकिस्तान हक्कानी नेटवर्क को लगातार मजबूत बनाते हुए अमेरिका को चिढ़ा रहा है।

अफगानिस्तान में अब जिसकी और जैसी भी सरकार बनेगी, वह और बड़े संकटों से घिरी होगी। इसमें भी कोई संदेह बाकी नहीं रह जाता कि ऐसी सरकार की चाबी पाकिस्तान के हाथ में होगी। दरअसल पाकिस्तान तालिबान को छुट्टा छोड़ने का खतरा नहीं लेना चाहता। तालिबान ने तो पाकिस्तान के खिलाफ ही तहरीक ए तालिबान पाकिस्तान (टीटीपी) नाम का आतंकी संगठन खड़ा कर रखा है। हक्कानी नेटवर्क जैसे आतंकी संगठनों के जरिए वह तालिबान पर भी लगाम कस सकेगा। हालांकि तालिबान का नेटवर्क भी आतंकी संगठनों से बना है। अलकायदा, इस्लामिक स्टेट, पूर्वी तुर्किस्तान आंदोलन, इस्लामिक मूवमेंट, जैश ए मोहम्मद, लश्करे तैयबा जैसे कई आतंकी संगठन इसमें शामिल हैं। ऐसे में अब काबुल में पाकिस्तान की मेहरबानी से जो भी सरकार बनेगी, उसे अगर आतंकी संगठनों की सरकार भी कहा जाए तो गलत नहीं होगा।

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