देश में सबसे निचले तबके की पांच से दस फीसद आबादी के उपभोग व्यय में तेज वृद्धि दर्ज की गई है। यानी इस वर्ग के लोग अपनी जरूरत के लिए विभिन्न वस्तुओं की खरीद पर अब ज्यादा खर्च करने लगे हैं। यह इस बात का संकेत है कि गरीबों की माली हालत में सुधार हुआ है। संसद में पेश की गई आर्थिक समीक्षा रपट में गरीबी का दायरा कम होने की यह तस्वीर उकेरी गई है। इसमें कहा गया है कि सरकार के सबसिडी, पेंशन, प्रत्यक्ष लाभ अंतरण और शिक्षा एवं स्वास्थ्य सेवा पर सार्वजनिक व्यय को प्राथमिकता जैसे कदमों के परिणामस्वरूप कमजोर वर्ग अभाव से उबरे हैं।

यह सही है कि पिछले कुछ वर्षों में अर्थव्यवस्था के क्षेत्र में तस्वीर बदली है। मगर सवाल है कि गरीबी से उबरने का आकलन करने के पैमाने क्या हैं? क्या इस प्रक्रिया में सिर्फ वस्तुओं की खरीद पर खर्च बढ़ने को आधार बनाना काफी है? समीक्षा में आंकड़ों के आधार पर कहा गया है कि देश में उपभोग असमानता में कमी आई है, मगर क्या वास्तव में इसे गरीबी कम होने का सूचक माना जा सकता है?

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आर्थिक समीक्षा रपट के अनुसार, वर्ष 2022-23 और 2023-24 के बीच समाज के सबसे निचले वर्ग के प्रति व्यक्ति औसत मासिक व्यय में वृद्धि ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों में देखी गई है। तर्क दिया गया है कि सरकारी नीतियों का आय वितरण पर महत्त्वपूर्ण असर हुआ है, जिससे गरीब तबके की खर्च करने की क्षमता बढ़ी है। मगर इस बात पर भी गंभीरता से विचार करने की जरूरत है कि जिसे ‘व्यय की क्षमता’ बढ़ने के रूप में देखा जा रहा है, उसका आधार क्या है। इसमें दोराय नहीं कि सामान्य तौर पर किसी भी परिवार के खर्च करने की क्षमता में तभी इजाफा होता है, जब उसकी आमदनी में बढ़ोतरी होती है।

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इसके बिना अगर गरीब परिवारों का वस्तुओं की खरीद पर व्यय बढ़ रहा है, तो यह महंगाई और मजबूरी से उपजी परिस्थितियों का नतीजा भी हो सकता है। जाहिर है, जैसे-जैसे महंगाई बढ़ती है, वैसे-वैसे रोजमर्रा की आवश्यक वस्तुओं पर हर किसी को ज्यादा खर्च करना पड़ता है। आमदनी बेहद कम होने और किसी वस्तु की अत्यधिक जरूरत पड़ने पर गरीब परिवार बैंक या साहूकार से कर्ज लेकर भी खर्च करते हैं। इस सूरत में ऐसे परिवारों के व्यय में बढ़ोतरी होना स्वाभाविक है, पर क्या इसे यह मान लिया जाए कि वे गरीबी से उबर गए हैं!

यह सवाल भी महत्त्वपूर्ण है कि क्या सरकार की ओर से आवश्यक वस्तुओं की खरीद पर सबसिडी या मुफ्त राशन देने से गरीबी कम हो जाती है। और अगर देश में जमीनी स्तर पर वास्तव में गरीबी कम हो गई है, तो आज भी सरकार की ओर से करीब अस्सी करोड़ लोगों को तय मात्रा में मुफ्त राशन उपलब्ध कराने की जरूरत क्यों महसूस हो रही है। कोविड काल में शुरू की गई इस योजना को एक जनवरी, 2024 से अगले पांच साल तक बढ़ा दिया गया।

ऐसे में जरूरी है कि गरीबी को आंकड़ों के जरिए कागजों पर खत्म करने की बजाय इस दिशा में धरातल पर प्रयास किए जाएं। कमजोर वर्ग के उत्थान के लिए उनकी आजीविका के स्थायी साधन विकसित करना जरूरी है और यह तभी संभव हो पाएगा, जब गरीबों के लिए शिक्षा और रोजगार के सस्ते, सुलभ और पर्याप्त अवसर उपलब्ध होंगे। उम्मीद है कि बजट में सरकार इस मसले पर कोई ठोस घोषणा करेगी।