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संपादकीय: हादसे की पट्टी

कोझिकोड का यह हवाई अड्डा पहाड़ी के ऊपर बना है, जिसे टेबलटॉप कहा जाता है। इसकी पट्टी केरल के सभी हवाई अड्डों में सबसे छोटी है। इसलिए भी इस पर विमानों को उतारते वक्त खासी सावधानी बरतने की जरूरत होती है। मगर तेज बारिश की वजह से पट्टी पर विमान के पहियों को समुचित घर्षण नहीं मिल पाया और वह खाई में जा गिरा। इस वजह से विमान के दो टुकड़े हो गए।

हाल ही में केरल के कोझीकोड में हुए विमान हादसे के बाद का दृश्य।

केरल के कोझिकोड हवाई अड्डे पर एयर इंडिया के विमान के हवाई पट्टी से फिसल कर खाई में जा गिरने और उसमें दो चालक समेत अठारह लोगों के मारे जाने की घटना ने एक बार फिर छोटी हवाई पट्टी वाले अड्डों के संचालन में सावधानी बरते जाने की जरूरत रेखांकित की है। यह विमान वंदेभारत अभियान के तहत भारतीय नागरिकों को दुबई से लेकर आया था। उतरते वक्त भारी बारिश और हवाई पट्टी पर फिसलन होने की वजह से रुक नहीं पाया और पैंतीस फुट गहरे खाई में जा गिरा।

कोझिकोड का यह हवाई अड्डा पहाड़ी के ऊपर बना है, जिसे टेबलटॉप कहा जाता है। इसकी पट्टी केरल के सभी हवाई अड्डों में सबसे छोटी है। इसलिए भी इस पर विमानों को उतारते वक्त खासी सावधानी बरतने की जरूरत होती है। मगर तेज बारिश की वजह से पट्टी पर विमान के पहियों को समुचित घर्षण नहीं मिल पाया और वह खाई में जा गिरा। इस वजह से विमान के दो टुकड़े हो गए। गनीमत है, विमान में आग नहीं लगी और ज्यादातर यात्रियों को सुरक्षित या मामूली घायल अवस्था में बाहर निकाल लिया गया। हालांकि इसमें कई लोग गंभीर रूप से घायल हैं और विभिन्न अस्पतालों में उनका इलाज चल रहा है।

पहाड़ों पर बने हवाई अड्डों की पट्टियां आमतौर पर सामान्य अड्डों की अपेक्षा छोटी होती हैं। कई जगह उनके विस्तार की भी गुंजाइश नहीं है। इन पट्टियों पर विमान उतारने के लिए चालक को विशेष सावधानी बरतनी पड़ती है। जब विमान हवाई पट्टी पर उतरता है, तब उसकी रफ्तार कम से कम सौ से डेढ़ सौ किलोमीटर प्रतिघंटा होती है। उस रफ्तार को छोटी पट्टियों पर संभालना कठिन होता है। कोझिकोड हवाई अड्डे पर बारिश की वजह से शायद ऐसे खतरे की आशंका थी, इसीलिए अड्डा संचालकों ने हादसे का शिकार हुए विमान को पहले नहीं उतरने देने का निर्णय किया था, मगर फिर इसे उतरने दिया गया।

अब यह जांच से पता चलेगा कि संचालकों ने ऐसी आशंका के बावजूद विमान को क्यों उतरने दिया। घरेलू और विदेशों के लिए चलाए जाने वाले विमानों की बनावट, क्षमता, रफ्तार आदि के मामले में प्राय: अंतर होता है। विदेशी उड़ानों के लिए इस्तेमाल होने वाले विमान घरेलू विमानों की अपेक्षा आकार में कुछ बड़े होते हैं, उनका वजन भी अधिक होता है। ऐसे विमानों को अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डों पर ही उतरने की इजाजत होती है। वहां उनके लिए पट्टियों की लंबाई उचित होती है। छोटी पट्टी वाले अड्डे घरेलू विमानों के लिए ही उचित माने जाते हैं।

पर पिछले कुछ सालों से जिस तरह विमानन के क्षेत्र में विस्तार हुआ है, अनेक निजी कंपनियां भी इस क्षेत्र में उतर आई हैं और विदेशी उड़ानों की संख्या लगातार बढ़ती गई है, उसमें कई घरेलू हवाई अड्डों को भी अंतरराष्ट्रीय अड्डे में बदल दिया गया है। मगर वहां जगह की कमी के कारण पट्टियों की लंबाई नहीं बढ़ाई जा सकी है। इस तरह वहां विमान उतारना हमेशा जोखिम भरा काम होता है। यह बात अनेक बार विमान चालक और विमानन से जुड़े संगठन भी दर्ज करा चुके हैं। मगर इस क्षेत्र में बढ़ती कारोबारी होड़, मुसाफिरों की सुविधा, हवाई अड्डों पर उड़ानों का दबाव, उन्हें ठहराने के लिए जगह की कमी आदि की वजह से इस दिशा में कोई व्यावहारिक कदम नहीं उठाया जा सका है। मगर छोटी पट्टी वाले अड्डों पर जब खराब मौसम की वजह से खतरे की आशंका हो, तो विमानों को दूसरी जगह उतारने में हिचक क्यों होनी चाहिए।

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