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सकारात्मक संकेत

अर्थव्यवस्था की सेहत सुधरने के दो खास संकेत मिले हैं। केंद्रीय सांख्यिकी कार्यालय की ओर से जारी आंकड़ों के मुताबिक जून में औद्योगिक उत्पादन में उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज हुई। दूसरी ओर, जुलाई में महंगाई का ग्राफ नीचे आया है। निश्चय ही ये दोनों तथ्य देश की अर्थव्यवस्था बेहतर होने की गवाही देते हैं। विडंबना यह […]

Author August 14, 2015 8:33 AM

अर्थव्यवस्था की सेहत सुधरने के दो खास संकेत मिले हैं। केंद्रीय सांख्यिकी कार्यालय की ओर से जारी आंकड़ों के मुताबिक जून में औद्योगिक उत्पादन में उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज हुई। दूसरी ओर, जुलाई में महंगाई का ग्राफ नीचे आया है। निश्चय ही ये दोनों तथ्य देश की अर्थव्यवस्था बेहतर होने की गवाही देते हैं। विडंबना यह है कि ये आंकड़े ऐसे समय आए जब अनेक अहम विधेयक संसदीय गतिरोध में फंसे हुए हैं।

गुरुवार को मानसून सत्र का आखिरी दिन था। बहरहाल, ताजा आंकड़े बताते हैं कि जून में औद्योगिक उत्पादन में 3.8 फीसद की वृद्धि हुई, जो कि चार महीनों में सबसे ज्यादा थी। लेकिन यह बढ़ोतरी औद्योगिक क्षेत्र के सभी घटकों में नहीं हुई है। वृद्धि का ज्यादातर श्रेय मैन्युफैक्चरिंग को जाता है। आइआइपी यानी औद्योगिक उत्पादन सूचकांक में मैन्युफैक्चरिंग का हिस्सा करीब तीन चौथाई है। इसलिए मैन्युफैक्चरिंग के प्रदर्शन का स्वाभाविक ही आइआइपी पर खासा प्रभाव पड़ता है।

जून में मैन्युफैक्चरिंग की वृद्धि दर 4.6 फीसद रही। जबकि यह मई में दो फीसद थी और पिछले साल जून में 2.9 फीसद। कृषि के बाद मैन्युफैक्चरिंग देश में रोजगार का सबसे बड़ा स्रोत है। इसलिए इस क्षेत्र की वृद्धि दर रोजगार के लिहाज से भी मायने रखती है। मगर निवेश की दृष्टि से ताजा आंकड़े निराश करते हैं। पूंजीगत सामान की खपत को नए निवेश का सूचक माना जाता है।

बुधवार को जारी किए गए आंकड़े बताते हैं कि जून में पूंजीगत सामान की उत्पादन दर में गिरावट आई, जबकि गैर-टिकाऊ उपभोक्ता सामान की खपत में मामूली बढ़ोतरी हुई। चाहे पिछले साल की समान अवधि से तुलना करें या पिछले महीने यानी मई से, बिजली और खनन में भी गिरावट दर्ज हुई है। बिजली की वृद्धि दर महज 1.3 फीसद रही, जबकि मई में यह छह फीसद थी।

अगर जून में बिजली क्षेत्र का ऐसा हाल न रहता तो आइआइपी का ग्राफ और ऊपर जा सकता था। यहां यह बात नहीं भूलनी चाहिए कि वृद्धि दर के आंकड़े बहुत कुछ आधार-वक्त यानी पिछले साल की समान अवधि के प्रदर्शन पर निर्भर करते हैं। अगर किसी क्षेत्र में पिछले साल वृद्धि ऊंची रही हो, तो उसमें कमी आने की काफी संभावना रहती है। इसका उलटा भी होता है, यानी पिछले साल जिस महीने में वृद्धि दर ऋणात्मक या मामूली रही हो, अगले साल उसी महीने में वृद्धि दर के चढ़ने के आसार रहते हैं। ताजा आंकड़ों पर भी यह बात लागू होती है।

मसलन, इस साल जून में बिजली क्षेत्र की वृद्धि सिर्फ 1.3 फीसद रही, जबकि पिछले साल के इसी महीने में यह 15.7 फीसद थी। आधार-वर्ष के बरक्स गिरावट या उठान का हाल आइआइपी के कई अन्य घटकों में भी दिखता है। आइआइपी खासकर मैन्युफैक्चरिंग के उत्साहजनक प्रदर्शन ने अप्रत्यक्ष कर संग्रह में भी बढ़ोतरी की नई उम्मीद जगाई है। जुलाई में उपभोक्ता सूचकांक पर आधारित महंगाई दर 3.78 फीसद दर्ज हुई, जो कि आठ महीनों में सबसे कम है। इससे एक बार फिर ब्याज दरें घटाने की मांग उठ सकती है। अगर रिजर्व बैंक इस दिशा में कदम उठाए तो उसे स्वागत-योग्य ही कहा जाएगा।

 

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