यमुना का प्रदूषण

देश की राजधानी दिल्ली वायु प्रदूषण के कहर से तो जूझ ही रही है, अब यमुना के जहरीले पानी ने भी मुश्किलें खड़ी कर दी हैं।

दिल्ली में यमुना के झाग वाले पानी के बीच स्नान करते श्रद्धालु (फोटो: पीटीआई)

देश की राजधानी दिल्ली वायु प्रदूषण के कहर से तो जूझ ही रही है, अब यमुना के जहरीले पानी ने भी मुश्किलें खड़ी कर दी हैं। काफी समय से यमुना के पानी में अमोनिया की बढ़ी मात्रा ने चिंता बढ़ा दी है। दिल्ली में यमुना में पानी में बर्फ के पिंडों की तरह झाग तैर रहे हैं। पानी अत्यधिक जहरीला हो चुका है। इस कारण कई इलाकों में पीने के पानी की आपूर्ति भी नहीं हो पा रही है। लोगों को जल संकट का सामना करना पड़ रहा है। हालांकि यमुना में अमोनिया का स्तर बढ़ने और पानी के जहरीले होने की समस्या कोई आज की नहीं है। ऐसा पिछले कई सालों से देखा जा रहा है।

ज्यादा चिंताजनक बात तो यह है कि लंबे समय से यह समस्या बनी रहने के बावजूद इसके समाधान का रास्ता निकालने को कोई तैयार नहीं है। यमुना के प्रदूषण के लिए दिल्ली सरकार पड़ोसी राज्यों हरियाणा और उत्तर प्रदेश को इसका जिम्मेदार ठहरा रही है, तो दूसरी ओर ये राज्य कुछ सुनने को तैयार नहीं। कुल मिलाकर यमुना का यह संकट राजनीति के दुश्चक्र में उलझ कर रह गया है। ऐसे में बड़ा सवाल यह है कि यमुना प्रदूषण मुक्त कैसे हो और दिल्ली का जल संकट भी खत्म हो।

गौरतलब है कि हरियाणा और उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों की औद्योगिक इकाइयों से जो अपशिष्ट और जहरीले रसायन निकलते हैं, उन्हें यमुना में छोड़ दिया जाता है। वैसे यह समस्या देश की तमाम छोटी-बड़ी नदियों के साथ है। ये नदियां जिन शहरी इलाकों खासतौर से औद्योगिक शहरों से गुजरती हैं, वहां का अपशिष्ट इनमें बहा दिया जाता है। इसलिए आज ज्यादातर नदियां खतरनाक स्तर तक प्रदूषित हो चुकी हैं। दिल्ली की समस्या इसलिए ज्यादा गंभीर होती जा रही है कि जिस जगह से आपूर्ति के लिए पानी लिया जाता है, वह हिस्सा हरियाणा में पड़ता है।

हयिाणा के पानीपत, सोनीपत, करनाल जैसे कई शहरों का औद्योगिक अपशिष्ट सीधे यमुना में आ रहा है। इसी तरह दिल्ली से सटे गाजियाबाद शहर में भी छोटे-बड़े उद्योगों की संख्या काफी है और यहां से निकलने वाला जहरीला कचरा और पानी भी यमुना में गिरता है। ठंड के मौसम में यह समस्या विकराल रूप धारण कर लेती है। ऐसे में यमुना को प्रदूषित होने से कैसे बचाया जा सकता है?

ऐसा नहीं कि यमुना के प्रदूषण को लेकर सरकारी महकमों और निकायों को कोई खबर नहीं है। प्रदूषण से निपटने के लिए राष्ट्रीय हरित पंचाट, केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड जैसे निकाय औद्योगिक इकाइयों के लिए समय-समय सख्त नियम बनाते रहे हैं। पर लगता है कि इनके दिशानिर्देशों पर अमल करवाने वाला तंत्र कमजोर साबित हो रहा है। वरना क्या कारण है कि सख्ती के बाद भी औद्योगिक कचरा और जहरीले रसायन यमुना में बहाए जा रहे हैं? औद्योगिक इकाइयों को सख्त हिदायत है कि वे तरल कचरा नदियों में प्रवाहित न करें। पर जिस सरकार, उसके महकमे और कानून प्रवर्तन एजंसी पर इसे सुनिश्चित करवाने की जिम्मेदारी है, लगता है वह काम ही नहीं कर रही।

ऐसी लाचारी समस्या को बढ़ाती ही है। यमुना के प्रदूषण से निपटने के लिए दिल्ली, हरियाणा और उत्तर प्रदेश को मिलकर काम करने की जरूरत है, न कि राजनीति करने की। जब तक तीनों राज्य साथ बैठ कर चर्चा नहीं करेंगे, कार्ययोजनाओं पर कदम नहीं बढ़ाएंगे और एक दूसरे पर आरोप मढ़ते रहेंगे तो कोई नतीजा नहीं निकलने वाला, बल्कि दिनोंदिन यह संकट गहराता जाएगा।

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