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संपादकीय: प्रदूषण के उद्योग

दिल्ली सहित समूचे राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र यानी एनसीआर का सवाल है, यहां किसी न किसी वजह से पूरे साल प्रदूषण की स्थिति सुर्खियों में रहती है। लेकिन कभी समस्या की जड़ पर बात करने और उसे दूर करने के लिए ठोस पहल नहीं होती है।

Coronavirus, COVID-19, Air Pollution in Delhi, Air Pollution, Delhi, NCRनई दिल्ली में वायु प्रदूषण को कम करने के लिए एंटी-स्मॉग गन से स्प्रे करता हुआ एक कर्मचारी। (PTI Photo)

राजधानी दिल्ली और आसपास के शहरों में प्रदूषण की स्थिति को लेकर पिछले कई सालों से लगातार चिंता जताई जाती रही है। लेकिन जब भी प्रदूषण की वजह से हालात गंभीर होते हैं, तब सरकारों की ओर से मुख्य कारणों पर गौर करने और उसके समाधान के उपाय करने के बजाय अलग-अलग कारकों को जिम्मेदार बता कर अपना कर्तव्य पूरा मान लिया जाता है। यह एक तरह से प्रदूषण पर काबू पाने में अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ना है, जिसके बाद होता यही है कि कुछ समय बाद फिर वैसे ही हालात सामने खड़े हो जाते हैं।

जहां तक दिल्ली सहित समूचे राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र यानी एनसीआर का सवाल है, यहां किसी न किसी वजह से पूरे साल प्रदूषण की स्थिति सुर्खियों में रहती है। लेकिन कभी समस्या की जड़ पर बात करने और उसे दूर करने के लिए ठोस पहल नहीं होती है।

खासतौर पर ठंड बढ़ने के साथ वायुमंडल के घनीभूत होने से प्रदूषण का संकट ज्यादा गहरा जाता है। मगर ऐसी स्थिति में पिछले कुछ सालों से लगातार पंजाब और हरियाणा के किसानों के पराली जलाने को मुख्य कारक बता कर चिंता को उसी पर केंद्रित कर दिया जाता है। जबकि दिल्ली सहित एनसीआर के पूरे इलाके में प्रदूषण की समस्या गहराते जाने में बेशुमार वाहनों और औद्योगिक इकाइयों की अहम भूमिका रही है।

खासतौर पर औद्योगिक इकाइयों से निकलने वाला धुआं एनसीआर के प्रदूषण में अकेले ही बीस से बाईस फीसद तक की भूमिका निभाता है। इसलिए समय-समय पर इन इलाकों में चलने वाले उद्योगों को प्रदूषणरोधी यंत्र लगाने से लेकर ईंधन के उपयोग को लेकर सख्त दिशा-निर्देश जारी किए गए हैं। लेकिन आज भी हकीकत यह है कि संबंधित सरकारी महकमे औद्योगिक इकाइयों से निकलने वाले धुएं को नियंत्रित नहीं कर सके हैं।

साल भर पहले जब दिल्ली सहित पूरे एनसीआर में प्रदूषण की समस्या विकराल हो गई थी, तब पर्यावरण प्रदूषण (रोकथाम और नियंत्रण) प्राधिकरण ने दिल्ली और इससे सटे इलाकों, मसलन गुरुग्राम, फरीदाबाद, नोएडा, गाजियाबाद, सोनीपत और बहादुरगढ़ आदि में प्राकृतिक गैस को छोड़ कर अन्य ईंधनों का इस्तेमाल करने वाले उद्योगों पर प्रतिबंध लगाने की घोषणा की थी। लेकिन प्रदूषण में तात्कालिक तौर पर कमी आने के बाद वह पाबंदी हटा ली गई थी और निर्देश जारी किया गया था कि औद्योगिक इकाइयों में प्रदूषण नियंत्रण के समुचित उपाय करने के साथ-साथ पर्यावरण संरक्षण के निर्धारित मानकों को पूरा किया जाए। लेकिन साल भर बाद अब फिर उसी तरह के हालात पैदा हो गए हैं, जब एनसीआर में वायु की गुणवत्ता ‘बेहद खराब’ दर्ज हो रही है।

हालांकि अब दिल्ली-एनसीआर की आबोहवा को सुधारने के लिए के लिए बनाए गए वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग ने माना है कि औद्योगिक क्षेत्र इस समूचे क्षेत्र में वायु प्रदूषण के सबसे अहम कारकों में से एक है। इसके मद्देनजर आयोग ने फिलहाल दिल्ली के सभी उद्योगों को अगले महीने के आखिर तक प्राकृतिक गैस आधारित बनाने का आदेश दिया है। आयोग ने इंद्रप्रस्थ गैस लिमिटेड, दिल्ली प्रदूषण नियंत्रण समिति और दिल्ली सरकार को कहा कि वे मिल कर यह सुनिश्चित करें कि तय समय में एनसीआर के सभी उद्योग पीएनजी का इस्तेमाल शुरू कर सकें।

इसके साथ ही अनधिकृत ईंधनों का प्रयोग करने वाली औद्योगिक इकाइयों के खिलाफ कार्रवाई की जाए। यह किसी से छिपा नहीं है कि दिल्ली को दुनिया के दस सबसे प्रदूषित शहरों में दूसरे स्थान पर होने का दर्जा प्राप्त है। अगर समय रहते एनसीआर के प्रदूषण को नियंत्रित करने के लिए ठोस कदम नहीं उठाए गए तो आने वाले दिनों का अंदाजा लगाया जा सकता है।

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