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संपादकीयः ढोल की पोल

गुजरात के विकास का ढोल पीट कर अक्सर मुनादी की जाती रही है कि अन्य राज्यों को उसे अपने लिए नजीर बनाना चाहिए। स्वयं प्रधानमंत्री देश-विदेश के विभिन्न मंचों से गुजरात के विकास का भावुक गुणगान करते रहे हैं।
Author March 23, 2016 03:51 am
(Express Photo)

गुजरात के विकास का ढोल पीट कर अक्सर मुनादी की जाती रही है कि अन्य राज्यों को उसे अपने लिए नजीर बनाना चाहिए। स्वयं प्रधानमंत्री देश-विदेश के विभिन्न मंचों से गुजरात के विकास का भावुक गुणगान करते रहे हैं। लेकिन शिक्षा के मामले मेंं उनके गृह-राज्य के विकास की पोल खुद वहां की सरकार ने खोल दी है। उसने विधानसभा में माना है कि राज्य के सरकारी प्राथमिक स्कूलों में तेरह हजार से ज्यादा शिक्षकों के पद खाली हैं। यह स्वीकारोक्ति राज्य में शिक्षकों के अभाव में शिक्षा के स्तर में आ रही गिरावट के कांग्रेस के आरोपों के जवाब में सामने आई है।

इसके मुताबिक गुजरात के विद्यालयों में केवल एक लाख सड़सठ हजार चार सौ इकसठ प्राथमिक शिक्षक हैं जबकि उनके लिए स्वीकृत पदों की संख्या एक लाख अस्सी हजार छह सौ एक है। अर्थात प्राथमिक शिक्षकों के तेरह हजार एक सौ चालीस पद खाली हैं। एक साधन-संपन्न राज्य में इतनी बड़ी संख्या में प्राथमिक स्कूलों के शिक्षकों की नियुक्ति न होना चिंता का विषय है। इन स्कूलों में शिक्षकों की कमी का मुद््दा विधानसभा और उसके बाहर कई बार उठा, लेकिन सरकार के कानों पर जूं नहीं रेंगी है। पिछले दिनों प्रदेश के शिक्षा राज्यमंत्री ने सदन में बताया कि सरकार प्राथमिक शिक्षकों की नियुक्ति इसलिए नहीं कर पा रही कि उसे ‘समुचित अभ्यर्थी’ नहीं मिले हैं।

अगर ऐसा है तो यह और भी अफसोसनाक है और यह राज्य में शिक्षक-प्रशिक्षण की दयनीय दशा की ओर इशारा करता है। एक तरफ सभी राज्यों में बेरोजगारों में सबसे अधिक संख्या प्रशिक्षित शिक्षकों की है वहीं गुजरात में प्राथमिक स्कूलों के लिए समुचित अभ्यर्थी न मिल पाना शिक्षा की पहली सीढ़ी पर ही मौजूद शैक्षिक दारिद्रय की ओर इशारा करता है जिसे जल्दी से जल्दी दूर करने की जरूरत है।

यह दरिद्रता देश में एक अप्रैल 2010 से लागू शिक्षा के अधिकार में भी पलीता लगा रही है। गौरतलब है कि मौलिक अधिकार के समकक्ष इस अधिकार के तहत छह से चौदह साल के आयुवर्ग के सभी बच्चों को मुफ्तऔर अनिवार्य शिक्षा का प्रावधान किया गया है। इसमें ‘मुफ्त’ और ‘अनिवार्य’ को परिभाषित करते हुए सरकार के लिए यह शिक्षा मुहैया कराना बाध्यकारी भी बनाया गया गया है। लेकिन इस पर अमल की देशव्यापी हकीकत इस बाध्यता को मुंह चिढ़ा रही है।

लगभग सभी राज्य स्कूलों में शिक्षकों की कमी के मामले में एक-दूसरे से बाजी मारते नजर आ रहे हैं। शिक्षा अधिकार अधिनियम के मानकों के मुताबिक विद्यालयों में शिक्षकों और छात्रों का अनुपात एक और तीस होना चाहिए लेकिन कई राज्यों में यह एक और दो सौ से भी ज्यादा पाया गया है। प्राथमिक शिक्षकों की कमी पूरी करने के लिए कुछ राज्यों में शिक्षा मित्र, शिक्षाकर्मी, शिक्षा सेवक आदि नामों से ग्यारह महीने के अनुबंध आधार पर उप-शिक्षकों (पैरा टीचर्स) की नियुक्ति की गर्ई लेकिन इससे भी समस्या का समाधान नहीं हो पाया है। शिक्षा मित्रों की शैक्षिक अयोग्यता, प्रशिक्षण की कमी और नियुक्ति में भ्रष्टाचार के कारण भी इस तरह की भर्तियां विवादों में रही हैं। अस्थायी शिक्षकों की नियुक्ति को समस्या का स्थायी समाधान समझने की भूल स्थिति को और विकराल ही बना रही है। प्राथमिक शिक्षा ही नौनिहालों के भविष्य के लिए नींव का काम करती है। अगर यह नींव ही कमजोर होगी तो कल्पना की जा सकती है कि हम कैसा भारत बना रहे हैं!

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