देश में चुनावों के मद्देनजर राजनीतिक दलों की ओर से मतदाताओं को रिझाने के लिए जिस तरह मुफ्त तोहफों या उपहारों की राजनीति की जा रही है, उसने एक तरह से नतीजों की शुचिता को कसौटी पर रख दिया है। भारतीय राजनीति में पिछले कई वर्षों से यह प्रवृत्ति जटिल होती गई है। हालांकि इस मसले पर सवाल भी उठे हैं और मुफ्त तोहफों के जरिए मतदाताओं को प्रभावित करने को लोकतंत्र के लिए एक घातक चलन बताया गया है। विडंबना यह है कि लगभग सभी राजनीतिक दल इस प्रवृत्ति पर सवाल उठाते हैं, लेकिन मौका मिलने पर वे भी इसी तरीके को एक औजार की तरह इस्तेमाल करते हैं।

खासतौर पर जो दल या गठबंधन सत्ता में होते हैं, वे वादों या घोषणाओं के साथ-साथ चुनावों के ठीक पहले कोई योजना या कार्यक्रम लागू करने के जरिए भी मतदाताओं को लाभ पहुंचाने की कोशिश करते हैं। समय-समय पर सुप्रीम कोर्ट ने भी मुफ्त उपहारों को भारतीय राजनीति में एक घातक प्रवृत्ति बताया है, लेकिन इस पर रोक को लेकर अब तक कोई ठोस नियमन सामने नहीं आ सका है।

मुफ्त में बांटने के लिए राजनीतिक दलों में होड़ लगी है

यही वजह है कि आज राजनीतिक दलों के बीच एक तरह की होड़ देखी जाती है कि वोट हासिल करने के लिए मतदाताओं को कौन कितना ज्यादा लाभ पहुंचाने की घोषणा करता है। नतीजतन, स्वच्छ चुनाव और विवादरहित नतीजे आज एक सदिच्छा की तरह लगने लगे हैं। राजनीतिक दलों से यह उम्मीद करना मुश्किल हो गया लगता है कि इस दिशा में वे अपनी ओर से कोई ऐसी पहल करेंगे, जो चुनावी जीत के लिए मुफ्त की रेवड़ियों के चलन पर रोक लगाएं। इसलिए सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को इस मसले पर दायर एक जनहित याचिका पर सुनवाई के लिए सहमति दी है, तो इससे एक बार फिर मुफ्त की चुनावी रेवड़ियों पर लगाम लगने की उम्मीद जगी है।

गौरतलब है कि करीब चार साल पहले सुप्रीम कोर्ट की एक पीठ ने केंद्र और निर्वाचन आयोग से उस याचिका पर जवाब मांगा था, जिसमें चुनाव से पहले ‘अतार्किक मुफ्त उपहार की घोषणा’ या इसे वितरित करने वाली राजनीतिक पार्टी का चुनाव चिह्न जब्त या उसका पंजीकरण रद्द करने का निर्देश देने का अनुरोध किया गया था। उस समय पीठ ने इसे गंभीर मुद्दा करार दिया था और कहा था कि कभी-कभी मुफ्त उपहार योजना का बजट नियमित बजट से अधिक हो जाता है।

सवाल है कि अगर कोई मतदाता मुफ्त की सौगात दिए जाने के असर में किसी उम्मीदवार को वोट देता है, तो क्या यह एक तरह की सौदेबाजी नहीं कही जाएगी? अगर कोई सत्ताधारी पार्टी चुनावों के ठीक पहले किसी योजना या कार्यक्रम के जरिए मतदाताओं को आर्थिक लाभ पहुंचाती है, तो उसकी जीत को कितना निष्पक्ष माना जाएगा? दिनोंदिन बढ़ती मुफ्त उपहारों की राजनीति के बीच होने वाले चुनाव को किस हद तक स्वच्छ और स्वतंत्र कहा जाएगा?

अफसोस की बात यह है कि लंबे समय से इस पर सवाल उठने के बावजूद अब तक इस दिशा में ऐसा कानून जमीन पर नहीं दिखता है, जो राजनीतिक दलों को मतदाताओं के सामने मुफ्त उपहारों का लोभ परोसने और इसके जरिए उनका वोट हासिल करने की कोशिश करने से रोक सके। यह स्पष्ट होना चाहिए कि ‘अतार्किक मुफ्त उपहार’ के चुनावी वादे मतदाताओं को गलत तरीके से प्रभावित करने की कोशिश हैं और इससे न केवल राजनीतिक दलों के बीच स्वस्थ लोकतांत्रिक प्रतिस्पर्धा बुरी तरह प्रभावित होती है, बल्कि निर्वाचन प्रक्रिया की शुचिता भी दूषित होती है।

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