ताज़ा खबर
 

राजनीतिः घटने वन, बिगड़ता पर्यावरण

निश्चित रूप से विकास के लिए प्रकृति प्रदत्त संसाधनों का दोहन आवश्यक है। लेकिन इसकी सीमा भी निर्धारित होनी चाहिए, जिसका कि पालन नहीं हो रहा है। विकास के नाम पर जंगलों को उजाड़ने का ही नतीजा है कि आज मनुष्य को बढ़ते वैश्विक तापमान, ओजोन परत के क्षरण, भूकम्प, भारी वर्षा, बाढ़ और सूखे जैसी विपदाओं का सामना करना पड़ रहा है।

Author Published on: October 12, 2019 1:06 AM
वनों की कटाई के कारण प्रजातियां नष्ट हो रही हैं और जंगल सिकुड़ते जा रहे हैं।

अभिजीत मोहन

यह राहत की बात है कि सुप्रीम कोर्ट ने देश की वाणिज्यिक राजधानी मुंबई की आरे कालोनी में पेड़ों की कटाई पर रोक लगा दी है। इस कालोनी में मेट्रो कारशेड के लिए ढाई हजार से ज्यादा पेड़ काटे जाने थे और वहां के निवासी और पर्यावरण संरक्षक इसका विरोध कर रहे थे। प्रशासन ने विरोध करने वाले प्रदर्शनकारियों को गिरफ्तार कर जेल में डाल दिया। तब मामला शीर्ष अदालत में पहुंचा। हालांकि तब तक दो हजार से ज्यादा पेड़ काटे जा चुके थे। सरकार का तर्क है कि छोटे हिस्से से पेड़ काटे गए हैं। सरकार ने यह दलील भी दी कि इन पेड़ों को काटने से पहले तेईस हजार आठ सौ छियालीस पेड़ लगाए जा चुके हैं और पच्चीस हजार पौधे वृक्षारोपण के लिए बांटे गए हैं। लेकिन अदालत ने दो टूक कहा कि सवाल छोटे हिस्से का नहीं, बल्कि यह कानूनन गलत है तो इसकी इजाजत नहीं दी जा सकती।

सर्वोच्च अदालत के पूर्व आदेश के अनुसार राज्यों को किसी क्षेत्र को जंगल के रुप में अधिसूचित करना आवश्यक है, लेकिन महराष्ट्र सरकार ने अभी तक ऐसा नहीं किया है। पर्यावरण संरक्षकों और विशेषज्ञों की मानें तो आरे को ‘अवर्गीकृत जंगल’ के रुप में समझा जाता था और वहां पर्यावरण के प्रति संवेदनशील क्षेत्र में पेड़ों की कटाई अवैध है। महाराष्ट्र सरकार के मुताबिक यह अवर्गीकृत जंगल नहीं है और न ही यह संवेदनशील क्षेत्र है। सरकार ने पेड़ों की कटाई तब शुरू की थी जब बबई हाई कोर्ट ने आरे कालोनी को वन क्षेत्र घोषित करने और मुंबई नगर निगम की मेट्रो कारशेड के लिए पेड़ों की कटाई की इजाजत देने वाली अधिसूचना रद्द करने की मांग ठुकरा दी थी।

आज जिस तरह विकास के नाम पर पेड़ों की अंधाधुंध कटाई हो रही है और वनों को उजाड़ा जा रहा है, उससे पर्यावरण संतुलन बिगड़ गया है। पिछले साल भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) ने दावा किया था कि अगर जंगलों को बचाने की पहल तेज नहीं हुई तो 2025 तक देश के अन्य हिस्सों के साथ-साथ पूर्वोत्तर के छह राज्यों असम, मणिपुर, मेघालय, मिजोरम, नगालैंड और त्रिपुरा और केंद्र शासित प्रदेश अंडमान और निकोबार द्वीप समूह का वन क्षेत्र खत्म हो जाएगा, जो आकार में मॉरीशस के कुल क्षेत्रफल के बराबर बैठता है। इन राज्यों में 2005 से 2013 के बीच वन क्षेत्र में 0.3 प्रतिशत की दर से कमी दर्ज की गई है।

वैज्ञानिकों ने इन्हीं राज्यों के घटते वन क्षेत्र को 2025 के वन क्षेत्र के अनुमान के लिए आधार बनाया है और उनका यह शोध पिछले दिनों ‘अर्थ सिस्टम साइंस’ नामक जर्नल में छपा है। चूंकि यह शोध हैदराबाद स्थित इसरो के नेशनल रिमोट सेंसिंग सेंटर और तिरुवनंतपुरम स्थित इंडियन इंस्टीट्यूट आॅफ स्पेस साइंस एंड टेक्नोलॉजी के वैज्ञानिकों ने किया है, इसलिए शोध की विश्वसनीयता पर संदेह नहीं किया जा सकता। वैज्ञानिकों का दावा है कि एक सौ तैंतीस साल में चालीस प्रतिशत वन क्षेत्र कम हो चुका है। वर्ष 1880 में देश में 10.42 लाख वर्ग किलोमीटर वन क्षेत्रफल होने का अनुमान लगाया गया था, जो देश के 37.1 प्रतिशत भौगोलिक हिस्से को दर्शाता था। लेकिन विकास के नाम पर वनों की अंधाधुंध कटाई की वजह से 1880 से 2013 के बीच इसमें चालीस प्रतिशत की कमी आई है। गंभीर चेतावनी तो यह है कि साल 2025 तक इसमें और कमी आने की आशंका है।

वन क्षेत्र में आ रही कमी के बारे में अध्ययन के लिए वैज्ञानिकों ने कंप्यूटर पर लैंड चेंज मॉडलर सॉफ्टवेयर पर प्राचीन भारत के वन क्षेत्र का मॉडल तैयार किया है। इनमें उन इलाकों का पर्यवेक्षण किया गया है, जहां वन क्षेत्र में सर्वाधिक कमी हो रही है। वैज्ञानिकों का कहना है कि उत्तर-पूर्वी राज्यों में गैर-सरकारी संस्थाओं द्वारा अधिकांश वन क्षेत्र की भूमि को लीज पर लेने और बड़े स्तर पर वन क्षेत्रों को कृषि के लिए उपयोग में लाने के कारण वन क्षेत्र में लगातार गिरावट आ रही है। तथ्य यह भी कि अंधाधुंध विकास के नाम पर मानव प्रति वर्ष सात करोड़ हेक्टेयर वनों का विनाश कर रहा है। एक आंकड़े के मुताबिक पिछले सैकड़ों सालों में हमने प्रकृति की एक तिहाई से अधिक प्रजातियां नष्ट कर डाली हैं। जंगली जीवों की संख्या में भी पचास प्रतिशत की कमी आई है।

वन किसी भी राष्ट्र की अमूल्य निधि होते हैं, जो वहां की जलवायु, भूमि की बनावट, वर्षा, जनसंख्या के घनत्व, कृषि और उद्योग आदि को अत्यधिक प्रभावित करते हैं। भारत प्राकृतिक वन संपदा की दृष्टि से एक संपन्न देश रहा है। भारत में पौधों और वृक्षों की सैंतालीस हजार प्रजातियां पाई जाती हैं। लेकिन वनों की कटाई के कारण प्रजातियां नष्ट हो रही हैं और जंगल सिकुड़ते जा रहे हैं। यह स्थिति तब है जब वनों को बचाने के लिए 1950 से लगातार हर वर्ष जुलाई के प्रथम सप्ताह में वन महोत्सव कार्यक्रम आयोजित होता है, जिसके जरिए खेतों की मेड़ों, नदियों, नहरों और सड़कों के किनारे तथा बेकार भूमि पर वृक्षारोपण किया जाता है। वन-विकास कार्यक्रम को गति प्रदान करने के लिए सरकार ने 1952 में ही वन-नीति बना ली थी और वन विकास के लिए नई-नई घोषणाओं के साथ वनों का क्षेत्र बाईस प्रतिशत से बढ़ा कर तैंतीस प्रतिशत करने के संकल्प व्यक्त किया था।

इसके अलावा वनों पर सरकारी नियंत्रण रखने और वृक्षों की हरित पट्टी विकसित करने के कार्यक्रम भी तय किए। यही नहीं, वनों को बचाने के लिए 1965 में केंद्रीय वन आयोग की स्थापना भी की गई थी। इस आयोग का कार्य वनों से संबंधित आंकड़े और सूचनाएं एकत्रित करना और उन्हें प्रकाशित करना है। लेकिन विडंबना है कि इस कवायद के बावजूद वनों का क्षेत्रफल बढ़ने के बजाए उसमें लगातार घटता ही जा रहा है। स्थिति यह है कि आज देश के कुल भौगोलिक क्षेत्रफल के महज 20.64 प्रतिशत हिस्से पर ही वन क्षेत्र रह गया है। अगर समय रहते वनों को संरक्षित नहीं किया गया तो न केवल लकड़ी, उद्योगों के लिए कच्चा माल, पशुओं के लिए चारा, औषधियां, सुगंधित तेल का संकट उत्पन होगा, बल्कि पर्यावरण भी तेजी से प्रदूषित होगा।

वैज्ञानिकों का कहना है कि वनों के विनाश से वातावरण जहरीला होता जा रहा है। प्रतिवर्ष दो अरब टन अतिरिक्त कार्बन-डाइआक्साइड वायुमंडल में घुल-मिल रही है। इससे जीवन का सुरक्षा कवच मानी जाने वाली ओजोन परत को भारी नुकसान पहुंच रहा है। वायुमंडल में छत्तीस लाख टन कार्बन डाइआक्साइड की वृद्धि हो चुकी है और चौबीस लाख टन आक्सीजन समाप्त हो चुकी है। अगर यही स्थिति रही तो 2050 तक पृथ्वी के तापक्रम में लगभग चार डिग्री सेल्सियस तक वृद्धि हो सकती है। ओजोन परत को होने वाले नुकसान से कुछ खास किस्म के अत्यंत अल्पजीवी तत्वों (वीएसएलएस) की संख्या में तेजी से वृद्धि हुई है जो मानव जाति के अस्तित्व के लिए खतरनाक हैं। इन खास किस्म के अत्यंत अल्पजीवी तत्वों की ओजोन को नुकसान पहुंचाने में भागीदारी नब्बे फीसद है।

निश्चित रूप से विकास के लिए प्रकृति प्रदत्त संसाधनों का दोहन आवश्यक है। लेकिन इसकी सीमा भी निर्धारित होनी चाहिए, जिसका कि पालन नहीं हो रहा है। विकास के नाम पर जंगलों को उजाड़ने का ही नतीजा है कि आज मनुष्य को बढ़ते वैश्विक तापमान, ओजोन परत के क्षरण, भूकम्प, भारी वर्षा, बाढ़ और सूखे जैसी विपदाओं का सामना करना पड़ रहा है। अगर हालात ऐसे ही बने रहे और जंगलों को संवारने एवं संरक्षित करने की चेष्टा नहीं की गई तो वह दिन दूर नहीं जब पृथ्वी पर मनुष्य का जीवन असंभव हो जाएगा।

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ लिंक्डइन पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App

Next Stories
1 संपादकीयः अब पलटी
2 संपादकीयः वक्त का तकाजा
3 संपादकीयः संकट में संस्था