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संपादकीय: मध्यप्रदेश की कुर्सी

लोकतंत्र में सरकारें सदन में संख्याबल के आधार पर बनती और टिकी रहती हैं। इस दृष्टि से शिवराज सिंह चौहान का सत्ता में आना संविधान सम्मत है। पर यह सवाल अपनी जगह बना हुआ है कि इस तरह जनमत के विरुद्ध बनी सरकारें कहां तक जनतांत्रिक कही जा सकती हैं। चुनाव में लोग जिन प्रतिनिधियों को चुन कर भेजते हैं, उनसे यही अपेक्षा रहती है कि वे उनके हितों का ध्यान रखेंगे। मगर जब वे निहित स्वार्थों के चलते पाला बदल कर ऐसे दल के साथ खड़े हो जाते हैं, जिसे लोगों ने नकार दिया है, तो वह उम्मीद धूमिल पड़ जाती है।

Author Published on: March 25, 2020 4:46 AM
शिवराज सिंह चौहान रिकॉर्ड चौथी बार मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री बने। (फोटो सोर्स पीटीआई)

लंबी राजनीतिक उठापटक के बाद आखिरकार एक बार फिर शिवराज सिंह चौहान ने मध्यप्रदेश की कमान संभाल ली है। करीब पंद्रह महीने तक वहां कांग्रेस की सरकार रही, पर कुछ विधायकों के असंतोष और फिर इस्तीफे के बाद वह अल्पमत में आ गई। मुख्यमंत्री कमलनाथ को इस्तीफा देना पड़ा। कांग्रेसी विधायकों के पार्टी छोड़ने की वजह से भाजपा की संख्या सरकार बनाने के लायक हो गई और फिर शिवराज सिंह चौहान ने शपथ ले ली। इस नाटकीय घटनाक्रम की मुख्य कड़ी बने ज्योतिरादित्य सिंधिया, जिन्होंने कांग्रेस आला कमान और मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री कमलनाथ द्वारा अपनी उपेक्षा का आरोप लगाते हुए पार्टी से इस्तीफा दे दिया और फिर भाजपा में शामिल हो गए। उनके पीछे-पीछे उनके समर्थक बाईस विधायकों ने भी पार्टी छोड़ दी।

वे कई दिनों तक बंगलुरू के एक रिसॉर्ट में सुरक्षा घेरे के भीतर डेरा जमाए रहे। कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं ने उनसे संपर्क साधने, उन्हें मनाने की बहुत कोशिश की, पर वे अपने फैसले पर अडिग रहे। उन विधायकों का आरोप था कि मुख्यमंत्री कमलनाथ उनके निर्वाचन क्षेत्र की समस्याओं को दूर करने, खासकर किसानों से किए गए वादों को पूरा करने के मामले में अपेक्षित कदम नहीं उठा रही। अब वे विधायक भी भाजपा के पाले में चले गए हैं।

लोकतंत्र में सरकारें सदन में संख्याबल के आधार पर बनती और टिकी रहती हैं। इस दृष्टि से शिवराज सिंह चौहान का सत्ता में आना संविधान सम्मत है। पर यह सवाल अपनी जगह बना हुआ है कि इस तरह जनमत के विरुद्ध बनी सरकारें कहां तक जनतांत्रिक कही जा सकती हैं। चुनाव में लोग जिन प्रतिनिधियों को चुन कर भेजते हैं, उनसे यही अपेक्षा रहती है कि वे उनके हितों का ध्यान रखेंगे। मगर जब वे निहित स्वार्थों के चलते पाला बदल कर ऐसे दल के साथ खड़े हो जाते हैं, जिसे लोगों ने नकार दिया है, तो वह उम्मीद धूमिल पड़ जाती है।

मध्यप्रदेश में जनमत कांग्रेस के पक्ष में था, एक तरह से लोगों ने भाजपा को नकार दिया था। पर सत्तापक्ष और विपक्ष के बीच सीटों का फासला बहुत कम होने की वजह से कांग्रेस में टूट का लाभ भाजपा को मिला और वह फिर से सत्ता में आ गई। यह अकेला और नया उदाहरण नहीं है। इससे पहले भी कई राज्यों में बहुमत हासिल करने वाले दल में फूट पैदा करके कम सीटें पाने वाले दल सत्ता पर काबिज हो जाते रहे हैं। इस प्रवृत्ति के चलते एक तरह से जनता को छला और लोकतांत्रिक प्रक्रिया का मखौल ही उड़ाया जाता है। इस तरह मध्यप्रदेश की नई सरकार भी सवालों से परे नहीं है।

शिवराज सिंह चौहान ने चौथी बार मध्यप्रदेश की कमान संभाली है। उनकी छवि एक सौम्य नेता की रही है। प्रदेश में उनकी काफी लोकप्रियता है। पर व्यापमं घोटाले और किसानों के हितों की अनदेखी जैसे मुद्दों के चलते उन्हें ज्यादातर लोगों ने पिछले विधानसभा चुनावों में सत्ता से दूर कर दिया था। कांग्रेस ने अपने घोषणापत्र में किसानों, व्यापारियों और युवाओं के लिए कुछ ठोस योजनाएं पेश की थी। उन्हें लेकर लोगों में कुछ उम्मीद जगी थी। सरकार बनने के बाद उनमें से कुछ पर उसने कदम भी उठाए थे। अब शिवराज सिंह चौहान के सामने चुनौती यह होगी कि जिन मुद्दों पर सरकार की अनदेखी का आरोप लगाते हुए कांग्रेसी विधायक अलग हुए थे, उन मुद्दों पर वे कैसे और कितना व्यावहारिक कदम उठाते हैं।

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