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संपादकीयः विवाद के बोल

असम में एनआरसी यानी राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर की सूची के सामने आने के बाद उस पर उठा विवाद जिस तरह तूल पकड़ चुका है, वह चिंताजनक है।

Author August 2, 2018 2:38 AM
प्रभावित लोगों के सामने अपनी नागरिकता साबित करने की चुनौती खड़ी हो गई है।

असम में एनआरसी यानी राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर की सूची के सामने आने के बाद उस पर उठा विवाद जिस तरह तूल पकड़ चुका है, वह चिंताजनक है। यह ध्यान रखने की जरूरत है कि एनआरसी को अद्यतन करने का काम सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में चला और अभी तक उसका अंतिम स्वरूप जारी नहीं हुआ है। यह सही है कि चालीस लाख से ज्यादा लोग जिस तरह उस सूची से बाहर हो गए हैं, वह कोई मामूली आंकड़ा नहीं है। इसलिए इस मसले पर चिंतित होना स्वाभाविक ही है। प्रभावित लोगों के सामने अपनी नागरिकता साबित करने की चुनौती खड़ी हो गई है। यह कोई छिपी बात नहीं है कि देश भर में एक नागरिक के तौर पर जरूरी दस्तावेज तैयार कराने और उसे सुरक्षित रखने को लेकर जागरूकता की कमी पाई जाती है। इसलिए एनआरसी की सूची में जगह पाने के लिए मांगे गए दस्तावेजों में कमी की वजह से अगर इतनी बड़ी तादाद में लोग बाहर हो गए हैं, यह हैरानी की बात नहीं है। लेकिन नागरिकता से संबंधित मसला चूंकि संवेदनशील होता है और यह देश में रहने के अधिकार से जुड़ा है, इसलिए इस पर मची उथल-पुथल स्वाभाविक है।

हालांकि इस पर उठे विवाद के बाद खुद गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने कहा कि अभी यह अंतिम सूची नहीं है और जिनका नाम इसमें शामिल नहीं हो सका है, उन्हें अपनी नागरिकता को साबित करने के मौके मिलेंगे। सुप्रीम कोर्ट ने भी कहा है कि असम के एनआरसी में जिन चालीस लाख से अधिक लोगों के नाम शामिल नहीं हैं, उनके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की जा सकती है, क्योंकि फिलहाल यह सिर्फ एक मसौदा भर है। इसके अलावा, कई खबरों में इसमें दर्ज नामों और परिवारों को लेकर विसंगतियां भी सामने आ चुकी हैं। जाहिर है, एनआरसी की जिस सूची को लेकर तूफान खड़ा हो गया है, वह अंतिम सूची नहीं है और उसमें जगह नहीं पा सके लोगों के पास अभी मौके हैं। लेकिन विडंबना यह है कि बाकी मुद्दों की तरह इस मसले पर भी अमूमन सभी पक्ष अपनी राजनीति की सुविधा से हड़बड़ी में अपनी राय पेश करने में लग गए हैं। मसलन, कुछ राजनीतिक अंतिम सूची आने के पहले ही इससे बाहर रह गए लोगों को बांग्लादेशी घुसपैठिया घोषित कर रहे हैं, तो कुछ ने इस पूरी प्रक्रिया पर ही सवाल उठा दिया। एनआरसी से संबंधित विवाद के तूल पकड़ने के बाद एक ओर पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने गृहयुद्ध छिड़ जाने तक की चेतावनी दे डाली, तो तेलंगाना में भाजपा के एक विधायक टी राजा ने यहां तक कह दिया कि बांग्लादेशी आप्रवासी अगर भारत छोड़ कर नहीं जाते हैं तो उन्हें गोली मार दी जानी चाहिए।

सवाल है कि बिना सोचे-समझे इस तरह की प्रतिक्रियाओं को क्या परिपक्व बयान माना जा सकता है? क्या इन नेताओं को इस बात का अंदाजा नहीं है कि इन बयानों का सामान्य जनता पर क्या असर पड़ता है? ऐसी घटनाएं अक्सर सामने आई हैं कि किसी नेता के बेलगाम बोल के बाद उसके समर्थकों और विरोधियों के बीच टकराव की स्थिति बन गई। एनआरसी को अंतिम रूप देने की प्रक्रिया अभी जारी है और उसमें फिलहाल किसी भी वैध नागरिक की नागरिकता छिन जाने की नौबत नहीं आई है। एनआरसी से जुड़े सवाल बेहद संवेदनशील हैं और इस पर सभी राजनीतिक दलों को सावधानी से अपनी राय जाहिर करने की जरूरत है। लेकिन इस मसले पर जिस तरह की बयानबाजियां सामने आ रही हैं, अगर उन पर तुरंत लगाम नहीं लगाई गई तो इससे उपजी स्थिति को संभालना मुश्किल हो सकता है।

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