एक सप्ताह के भीतर अलग-अलग राजनीतिक दलों के दो नेताओं पर जिस तरह से हिंसक हमले हुए हैं, उससे सियासी गलियारों में एक अलग तरह की चिंता पैदा हो गई है। हाल में तृणमूल कांग्रेस प्रमुख एवं पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की कार पर भीड़ का हमला और अब शिरोमणि अकाली दल के अध्यक्ष एवं पंजाब के पूर्व उपमुख्यमंत्री सुखबीर सिंह बादल पर किरपाण से वार करने की घटनाओं ने प्रमुख नेताओं की निजी सुरक्षा को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

सरकार की ओर से ऐसे नेताओं को सुरक्षा मुहैया कराई जाती है, लेकिन सुरक्षा का यह घेरा क्या इतना कमजोर होता है कि कोई भी उसमें सेंध लगा सकता है? सवाल यह भी है कि क्या हिंसा या प्रतिशोध से किसी समस्या का समाधान हो सकता है? किसी भी राजनीतिक दल या उसके नेता के विचारों एवं कार्यों से असहमति व्यक्त की जा सकती है, लेकिन इसे तभी उचित ठहराया जा सकता है, जब यह नियम-कानून की सीमा के दायरे में हो।

गौरतलब है कि सुखबीर सिंह बादल पर बीते गुरुवार को उस वक्त हमला हुआ, जब वे महाराष्ट्र के नांदेड़ स्थित एक गुरुद्वारे में गए थे। एक शख्स ने अचानक किरपाण से उन पर हमला कर दिया, जिससे वे घायल हो गए। हालांकि बाद में पुलिस कर्मियों ने हमलावर को गिरफ्तार कर लिया, लेकिन हैरत इस बात की है कि सुखबीर को ‘जेड प्लस’ श्रेणी की सुरक्षा प्राप्त होने के बावजूद हमलावर उनके इतने करीब कैसे पहुंच गया?

यह पहली बार नहीं है जब उन पर इस तरह का हमला हुआ है, वर्ष 2024 में भी स्वर्ण मंदिर में उन पर जानलेवा हमला हुआ था। पुलिस के मुताबिक, नांदेड़ गुरुद्वारे में हमले का आरोपी वहां दो साल से सेवादार के रूप में काम कर रहा था। इस घटना को लेकर पुलिस जांच में तेजी और गंभीरता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि एक दिन बाद भी हमले के असली कारणों का पता नहीं चल पाया है।

पंजाब में अगले वर्ष विधानसभा चुनाव होने हैं और ऐसे में सुरक्षा की दृष्टि से भी यह घटना बेहद संवेदनशील है। राज्य में अलगाववादी ताकतें फिर से सिर न उठा पाएं, इसकी जिम्मेदारी केंद्र और राज्य सरकार दोनों की है।