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संपादकीय: नासमझी की मिसाल

पूर्णबंदी की घोषणा होने के बाद दिहाड़ी मजदूरों, रेहड़ी-पटरी का कारोबार या घरों में रोजमर्रा के काम करने वालों के सामने आजीविका का संकट पैदा हो गया। तमाम रेलें और सार्वजनिक वाहन बंद कर दिए गए थे, सो उन्हें अपने गांव-घर वापस लौटने का कोई साधन नजर नहीं आ रहा था।

Author Published on: April 1, 2020 3:08 AM
उत्तर प्रदेश के बरेली पहुंचें मजदरों पर कोरोना से बचाव वाली दवा या केमिकल का छिड़काव करता प्रशासन। फोटो- वीडियो स्नैप शॉट।

उत्तर प्रदेश के बरेली बस अड्डे पर जिस तरह प्रवासी मजदूरों को विसंक्रमित करने के इरादे से उन पर पुलिस और अग्निशमन विभाग के कर्मियों ने तेज रसायन का छिड़काव किया, वह नासमझी की मिसाल ही कही जाएगी। स्वाभाविक ही इस घटना पर विपक्षी दलों ने तीखी प्रतिक्रिया जताई है। दरअसल, वहां लोगों पर जिस सोडियम हाइपोक्लोराइड रसायन का छिड़काव किया गया, उसका उपयोग दीवारों, वस्तुओं आदि को विसंक्रमित करने के लिए किया जाता है।

आमतौर पर इसे डेंगू मच्छर के अंडों को समाप्त करने के लिए छिड़का जाता है। जब यह रसायन बरेली में रोक लिए गए लोगों के ऊपर छिड़का गया, तो उनमें कई बच्चे भी थे और उन्होंने अपनी आंखों में तेज जलन की शिकायत की। कई लोगों की आंखें लाल हो गईं। हालांकि अभी तक जांच नहीं की गई है कि उस रसायन के छिड़काव से उनकी आंखों या स्वास्थ्य पर कोई बुरा प्रभाव पड़ा है या नहीं। इस रसायन का छिड़काव मनुष्य पर नहीं किया जाता। पर पता नहीं किस हड़बड़ी में या किसकी नासमझ सलाह या आदेश से वहां तैनात कर्मियों ने लोगों को उस रसायन से नहला दिया और उन लोगों को संभलने या सावधान रहने की हिदायत तक नहीं दी। मनुष्य और वस्तु में भेद न समझना हद दर्जे की अमानवीयता है। इसके पीछे की कुछ वजहें समझी जा सकती हैं।

पूर्णबंदी की घोषणा होने के बाद दिहाड़ी मजदूरों, रेहड़ी-पटरी का कारोबार या घरों में रोजमर्रा के काम करने वालों के सामने आजीविका का संकट पैदा हो गया। तमाम रेलें और सार्वजनिक वाहन बंद कर दिए गए थे, सो उन्हें अपने गांव-घर वापस लौटने का कोई साधन नजर नहीं आ रहा था। ऐसे में वे सब पैदल ही निकल पड़े। हजारों की तादाद में मजदूर सड़कों पर चलते नजर आने लगे। इससे कोरोना के चक्र को तोड़ने का संकल्प प्रश्नांकित होने लगा। सामाजिक दूरी बना कर और अपने घरों में बंद रहने की अपील ठुकरा दी गई थी।

सो, केंद्र और राज्य सरकारें हरकत में आईं और उन्होंने आदेश जारी किया कि जो जहां है, उसे वहीं रोक दिया जाए और उसकी सुरक्षा के इंतजाम किए जाएं। इन प्रवासियों के अपने गांव-घर पहुंचने पर कोरोना के सामुदायिक संक्रमण का खतरा गहरा गया था। इसलिए उन्हें जगह-जगह रोका जाने लगा। यह एक हड़बड़ी का आलम था। इसमें सड़कों पर सुरक्षा के लिए तैनात लोगों को शायद समझ नहीं आया होगा कि इन लोगों की वजह से फैलने वाले संक्रमण को तुरंत कैसे रोका जा सकता है और उन्होंने एहतियातन यह कदम उठाया होगा।

मगर यह नहीं माना जा सकता कि छिड़काव करने वाले कर्मचारियों को इस बात का इल्म नहीं रहा होगा कि वे जिस रसायन का छिड़काव कर रहे हैं, वह कितना खतरनाक साबित हो सकता है और उसका उपयोग कहां नहीं करना है। इससे यह बात भी जाहिर होती है कि उनके लिए मजदूरों के जीवन का मोल तुच्छ है। हमारे देश में ऐसे लोगों के साथ प्रशासन का जैसा अक्सर हिकारत भरा रवैया देखा जाता है और वे कई बार उनके साथ पशुवत बर्ताव करने से भी बाज नहीं आते, बरेली की घटना भी उसी मानसिकता का नतीजा कही जा सकती है। इस घटना के लिए दोषी कर्मियों के खिलाफ कार्रवाई के आदेश उचित हैं। कोरोना विषाणु से रोक-थाम निस्संदेह एक बड़ी चुनौती है, पर हालात के मारे, बेदर लोगों के साथ ऐसा अमानवीय व्यवहार उन्हें नाहक सजा देने जैसा है।

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