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संपादकीयः दूध में जहर

दूध में मिलावट पर लगातार चिंता जताने के बावजूद यह हकीकत हैरान करने वाली है कि देश में अड़सठ फीसद दूध खाद्य नियामक प्राधिकरण के मानकों पर खरा नहीं उतरता।

Author Published on: March 18, 2016 3:28 AM
(File Photo)

दूध में मिलावट पर लगातार चिंता जताने के बावजूद यह हकीकत हैरान करने वाली है कि देश में अड़सठ फीसद दूध खाद्य नियामक प्राधिकरण के मानकों पर खरा नहीं उतरता। इसमें यूरिया से लेकर कास्टिक सोडा, डिटर्जेंट पाउडर, नकली चिकनाई, सफेद रोगन आदि तमाम तरह के रसायन मिले होते हैं। ये विषैले तत्त्व जीवनदायी दूध को धीमे जानलेवा जहर में तब्दील कर उसे विभिन्न गंभीर रोगों का जनक बना देते हैं। बुधवार को लोकसभा में केंद्रीय विज्ञान और प्रौद्योगिकी मंत्री हर्षवर्धन ने दूध में भयावह मिलावट पर चिंता जताते हुए उसे रोकने की एक नई तकनीक के विकास का दावा किया है।

उनके मुताबिक ऐसी तकनीक फिलहाल किसी अन्य देश में उपलब्ध नहीं है। मिलावट की थोड़ी मात्रा को भी पहचानने में सक्षम इस अत्यंत किफायती तकनीक से महज चालीस-पैंतालीस सेकेंड में दूध के नमूने की जांच हो जाती है और इसमें खर्च भी केवल पांच से दस पैसे आता है। लेकिन सवाल है क्या महज किसी तकनीक के भरोसे भारत जैसे विशाल देश में बड़े पैमाने पर दूध में होने वाली मिलावट को रोका जा सकता है? अब तक इस मिलावट को पहचानने के लिए रासायनिक प्रक्रिया अपनाई जाती थी और उसी से गुजर कर दुग्ध संयंत्रों और सहकारी समितियों का दूध ग्राहकों तक पहुंचता रहा है। फिर भी अगर देश में बिकने वाला अड़सठ फीसद दूध मिलावटी है तो क्या यह गहन चिंता और दूध की शुद्धता सुनिश्चित करने के उपायों पर पुनर्विचार का विषय नहीं होना चाहिए?

बहरहाल, सरकार ने सांसदों को अपने संसदीय क्षेत्र में सांसद निधि से दुग्ध मिलावट पहचानने की यह नई तकनीक पहुंचाने का सुझाव दिया है और साथ ही जीपीएस आधारित एक अन्य तकनीक विकसित करने की बात कही है जिससे पता लग सके कि सप्लाई के दौरान किस जगह दूध में मिलावट की गई। लेकिन हमें नहीं भूलना चाहिए कि दूध की मिलावट असल में इस धंधे में इंसानी लालच की मिलावट से भी जुड़ी समस्या है। हर तकनीक की अपनी सीमाएं होती हैं और ये सीमाएं मिलावट करने वालों के लालच पर लगाम लगा पाएंगी, इसमें संदेह है। इसके मद््देनजर हमें इस विकराल समस्या को समग्र रूप में देख कर दुग्ध उत्पादन से लेकर उसे ग्राहकों तक पहुंचाने की समूची प्रणाली की कड़ी निगरानी का तंत्र विकसित करना होगा।

यह इसलिए भी जरूरी है कि भारत विश्व का सबसे बड़ा दुग्ध उत्पादक देश है और यहां रोजाना दो लाख गांवों से दूध एकत्रित किया जाता है। हमारी ग्रामीण अर्थव्यवस्था को सुदृढ़ करने में डेयरी उद्योग की अहम भूमिका है। इतने बड़े और महत्त्वपूर्ण दुग्ध व्यवसाय के बावजूद दूध की गुणवत्ता पर निगरानी के लिए कारगर तंत्र का देश में लगभग अभाव है।

इस दिशा में अपनी किस्म का पहला प्रयास खाद्य संरक्षा और मानक प्राधिकरण ने 2011 में देश के अट्ठाईस राज्यों और पांच केंद्रशासित प्रदेशों में दूध की गुणवत्ता जांचने के लिए किया था, जिसमें सत्तर प्रतिशत नमूने मानकों पर खरे नहीं उतरे थे। उस सर्वे के नतीजों पर थोड़ी-बहुत चिंता जताने के बाद दुग्ध उद्योग को फिर मिलावटखोरों के भरोसे छोड़ दिया गया। हमें नहीं भूलना चाहिए कि भारत सबसे ज्यादा शाकाहारी आबादी वाला मुल्क भी है और इस विशाल जनसंख्या के लिए दूध और दुग्ध उत्पाद ही प्रोटीन के मुख्य स्रोत हैं। अगर इन स्रोतों से प्रोटीन के बजाय विषैले रसायन मिलेंगे तो क्या हम कभी स्वस्थ भारत का सपना साकार कर पाएंगे?

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