आंदोलन का मुकाम

अब किसान आंदोलन अपने अंतिम मुकाम पर पहुंचता लग रहा है।

अपनी मांगों को लेकर प्रदर्शन करते किसान। फाइल फोटो।

अब किसान आंदोलन अपने अंतिम मुकाम पर पहुंचता लग रहा है। विवादित कृषि कानूनों को वापस लेने, पराली जलाने को अपराध की श्रेणी से हटाने के बाद अब सरकार ने न्यूनतम समर्थन मूल्य पर कानून बनाने और किसानों पर से मुकदमे वापस लेने की दिशा में भी लचीला रुख दिखाया है। खुद किसान नेताओं ने घोषणा की है कि सरकार ने उनसे पांच प्रतिनिधियों के नाम मांगे हैं, जो न्यूनतम समर्थन मूल्य पर गठित होने वाली समिति के सदस्य होंगे। राज्य सरकारों को कह दिया गया है कि वे किसानों पर दर्ज मुकदमे वापस लेने की प्रक्रिया शुरू कर दें।

हरियाणा सरकार पहले से इसके लिए तैयार है। उधर किसान नेताओं का रुख भी लचीला नजर आ रहा है। हालांकि किसान नेता राकेश टिकैत ने कहा है कि जब तक सरकार एमएसपी पर कानून नहीं बनाती, आंदोलन के दौरान जान गंवाने वाले किसानों को मुआवजे और गृह राज्यमंत्री को उनके पद से हटाने की घोषणा नहीं करती, तब तक किसान अपने घर नहीं लौटेंगे। हालांकि संयुक्त किसान मोर्चा की सूची में बिजली की दरों को लेकर कानून बनाने, दूध के दाम निर्धारित करने आदि संबंधी मांगें भी शामिल हैं। मगर दो प्रमुख बड़ी मांगों पर सरकार के लचीले रुख को देखते हुए लगता है कि मोर्चे की अन्य मांगें मानने में उसे मुश्किल नहीं होगी।

न्यूनतम समर्थन मूल्य को लेकर कानून बनाने की मांग पुरानी है। इसे तय करने का पैमाना स्वामिनाथन समिति ने बहुत पहले पेश कर दिया था। इससे संबंधित कानून बनाने के लिए गठित समिति के अगुआ खुद तबके गुजरात के मुख्यमंत्री, और अब प्रधानमंत्री, थे। तब उन्होंने भी तत्कालीन केंद्र सरकार से सिफारिश की थी कि किसानों को उनकी फसलों पर कुल लागत मूल्य के साथ पचास फीसद मुनाफा जोड़ कर कीमत मिलनी चाहिए। इसलिए प्रधानमंत्री इस समस्या से अच्छी तरह अवगत हैं और उन्हें इस पर पारदर्शी ढंग से कानून बनाने में कोई गुरेज नहीं होना चाहिए।

इस पर कानून बन जाने के बाद किसानों के असंतोष को काफी हद तक कम किया जा सकता है। मगर सरकार के कुछ लोग इससे खजाने पर भारी बोझ पड़ने की आशंका जता रहे हैं। जबकि कई कृषि विज्ञानी और विशेषज्ञों का मानना है कि इसका सरकारी खजाने पर कोई भारी बोझ नहीं पड़ेगा। पहले सरकार को खुद इस उलझन से बाहर निकलना पड़ेगा। फिर, देखना है कि किसान नेता केवल समिति गठित करने की घोषणा पर कितना भरोसा करते हैं।

बेशक सरकार ने उत्तर प्रदेश सहित पांच राज्यों में होने वाले विधानसभा चुनावों के मद्देनजर यह लचीला रुख अपनाया है, पर उससे अपने इस रुख पर कायम रहने की अपेक्षा है। लोकतंत्र में सरकारें हठधर्मिता से नहीं चलतीं, जिन बातों पर एक बड़ी आबादी की असहमति हो, उन पर कदम वापस खींच लेना उसके जनतांत्रिक होने का परिचय देता है। किसानों पर दर्ज मुकदमे वापस लेने के साथ ही आंदोलन के समय उनका साथ देने वालों पर से भी मुकदमे हटाने की पहल होनी चाहिए। फिर किसान अगर गृह राज्यमंत्री की बर्खास्तगी की मांग पर अड़े हुए हैं, तो प्रधानमंत्री को इस पर भी सहज ढंग से विचार करना चाहिए। आखिर मंत्री का बेटा किसानों पर गाड़ी चढ़ाने का आरोपी है, जेल में है। इस तरह उन्हें नैतिक रूप से मंत्री पद पर बने रहने का अधिकार नहीं है। जब तक मामले में फैसला नहीं आ जाता, गृह राज्यमंत्री को उनके पद से अलग बिठाने में कोई हेठी नहीं हो जाएगी।

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