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संपादकीय: वक्त का तकाजा

हमारा देश फिलहाल कई मोर्चों पर एक साथ जूझ रहा है। एक तरफ, देश भर में कोरोना के संक्रमण की चुनौती है तो दूसरी ओर पड़ोसी देशों, खासकर चीन के साथ सीमा पर जिस तरह के हालात बने हुए हैं, उसमें बहुस्तरीय चौकसी बरतना भी अनिवार्य है।

पीएम नरेंद्र मोदी ने मामसून सत्र के शुरू होने से पहले वीर जवानों के साथ एकजुटता का संदेश दिया। (फोटो- पीटीआई)

संसद का मानसून सत्र शुरू होने से पहले प्रधानमंत्री ने जो बयान जारी किया है, उसकी अपनी अहमियत है। दरअसल, समूचे देश को प्रधानमंत्री ने एक जरूरी पैगाम दिया है कि मानसून सत्र में संसद एक स्वर में यह संदेश देगी कि वह हमारी सीमाओं की रक्षा करने वाले वीर जवानों के साथ एकजुटता से खड़ी है और ऐसा करना संसद की विशेष जिम्मेदारी भी है। इसके अलावा, उन्होंने कोरोना संक्रमण के मसले पर कहा कि जब तक इसकी दवाई नहीं बन जाती, तब तक कोई ढिलाई नहीं बरतनी है; हर आवश्यक सतर्कता का सभी को पालन करना है। लेकिन समूचे देश में कोरोना के संक्रमण की रफ्तार के बीच यह खबर चिंता पैदा करने वाली है कि संसद के मानसून सत्र में भाग लेने के लिए कोरोना जांच की अनिवार्यता तय होने के बाद करीब दो दर्जन सांसद संक्रमित पाए गए। निश्चित रूप से यह महामारी के फैलते पांव के बीच गंभीर स्थिति का सूचक है।

हमारा देश फिलहाल कई मोर्चों पर एक साथ जूझ रहा है। एक तरफ, देश भर में कोरोना के संक्रमण की चुनौती है तो दूसरी ओर पड़ोसी देशों, खासकर चीन के साथ सीमा पर जिस तरह के हालात बने हुए हैं, उसमें बहुस्तरीय चौकसी बरतना भी अनिवार्य है।

गौरतलब है कि पिछले कुछ महीनों से भारतीय सैनिक दुर्गम पहाड़ी इलाकों में बहादुरी के साथ अपना कर्तव्य निभा रहे हैं और आने वाले कुछ दिनों में उस इलाके में बर्फबारी भी होनी है। यानी चुनौतियां बढ़ सकती हैं। निश्चित रूप से हमारे जवान किसी भी मुश्किल स्थिति से निपटने की क्षमता रखते हैं, लेकिन ऐसे वक्त में अगर उन्हें प्रतिनिधि संस्था सहित समूचे देश का भावनात्मक साथ मिलता है तो चुनौतियों का सामना करने का उनका हौसला और ऊंचा होगा। यह देश की रक्षा का सवाल है और मुश्किल दौर में आलोचनाओं के बजाय आपस में सहयोग वक्त की जरूरत होती है।

हालांकि इसमें कोई संदेह नहीं कि किसी भी विषय पर पक्ष-विपक्ष के बीच चर्चा से हालात का सामना करने के नए रास्ते निकलते हैं। इसके महत्त्व को प्रधानमंत्री ने भी रेखांकित किया है कि लोकसभा में जितनी ज्यादा, गहन और विविधताओं से भरी चर्चा होती है, उतना ही सदन, विषय-वस्तु और देश को लाभ होता है। इसका सबसे प्रत्यक्ष उदाहरण वैश्विक महामारी कोरोना के संक्रमण से जूझने के मामले में देखा जा सकता है कि देश में इस पर काबू पाने के लिए जो भी उपाय किए गए, उसमें पक्ष-विपक्ष सहित सबने मतभेद भूल कर सरकार की कोशिशों का साथ दिया।

इसके बावजूद यह भी सच है कि कोरोना के संक्रमण की रफ्तार कम नहीं हुई है और इसके प्रति लापरवाही भारी पड़ सकती है। गौरतलब है कि संसद के मानसून सत्र में सांसदों के सदन में प्रवेश के लिए कोविड-19 की जांच की अनिवार्यता तय की गई थी। इसमें पहले ही दिन लोकसभा के सत्रह और राज्यसभा के आठ यानी कुल पच्चीस सांसद कोरोना संक्रमित पाए गए।

देश भर में संक्रमण की स्थिति जगजाहिर है, लेकिन अगर सुरक्षा और बचाव के तमाम इंतजामों के बावजूद सांसदों का भी संक्रमित होना नहीं रुक पा रहा है, तो यह चिंता की बात है। ऐसे में संक्रमण से बचाव और इसकी रफ्तार पर लगाम लगाना सबकी जिम्मेदारी है। लेकिन इसे थामने की तमाम कोशिशों के बावजूद अगर हालात ऐसे ही बने रहे तो संभव है कि महामारी के दौरान इसके निपटने के लिए तय नियम-कायदों को लेकर सरकार को फिर से सख्त कदम उठाने पड़ें। बेहतर यह हो कि जनता से लेकर जनप्रतिनिधि तक अपने स्तर पर कोरोना के संक्रमण की रफ्तार पर लगाम लगाने में अपनी-अपनी भूमिका का निर्वाह करें।

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