बजट सत्र के सातवें दिन संसद में जिस तरह की स्थितियां पैदा हुईं, वे निश्चित रूप से लोकतांत्रिक परंपराओं में संवाद के समांतर एक बार फिर मतभेदों के तीखे होने को ही दर्शाता है। मौजूदा सत्र में पिछले कई दिनों से लगातार हंगामे की स्थिति बनी रही और सदन की कार्यवाही बाधित होती रही। राष्ट्रपति के अभिभाषण के बाद बुधवार को प्रधानमंत्री धन्यवाद प्रस्ताव पर जवाब देने वाले थे, लेकिन शोर-शराबे और हंगामे की वजह से सदन को स्थगित कर दिया गया था।
विपक्षी दलों की ओर से उठाए गए सवालों और उतार-चढ़ाव के बीच आखिर गुरुवार को प्रधानमंत्री ने राज्यसभा को संबोधित किया। जबकि विपक्ष के नेता को न बोलने देने का मुद्दा उठाते हुए विपक्षी दलों ने सदन का बहिष्कार किया। दूसरी ओर सरकार का कहना था कि विपक्ष सदन नहीं चलने दे रहा।
जाहिर है, राष्ट्रपति के अभिभाषण पर जहां समग्र चर्चा होनी चाहिए थी, वहां सदन हंगामे की वजह से बाधित हुआ। इसके बावजूद प्रधानमंत्री ने सरकार के फैसलों और नीतियों को स्पष्ट करते हुए राज्यसभा में अपनी राय रखी।
पिछले कुछ समय से बदलती भू-राजनीतिक परिस्थितियों के बीच दुनिया भर में तेजी से नीतिगत स्तर पर भी बदलाव होते देखे जा रहे हैं और नई व्यवस्था की जमीन बनती दिख रही है। इसी संदर्भ में प्रधानमंत्री ने अपने भाषण में इसका उल्लेख करते हुए कहा कि मौजूदा दौर में स्थितियां संभाली नहीं जा पा रही हैं, तो ऐसे में स्पष्ट दिख रहा है कि दुनिया एक नई वैश्विक व्यवस्था की ओर बढ़ रही है।
इससे पहले दूसरे विश्वयुद्ध के बाद जो वैश्विक व्यवस्था बनी थी, वह अब बदल रही है और अगर इसे तटस्थ भाव से देखा जाए, तो साफ लग रहा है कि झुकाव भारत की ओर है। दरअसल, हाल के वर्षों में विकसित देशों के कूटनीतिक टकरावों और उससे उपजे हालात के बीच वैश्विक दक्षिण के रूप में देखे जाने वाले देशों की समस्याओं पर आवाज उठने की प्रक्रिया जिस तरह धीमी पड़ रही थी, उसमें भारत को एक उम्मीद की नजर देखा जा रहा था।
इसी को रेखांकित करते हुए प्रधानमंत्री ने कहा कि दुनिया भर में वैश्विक दक्षिण को लेकर होने वाली चर्चा के सूत्रधार के साथ-साथ भारत को वैश्विक दक्षिण की बुलंद आवाज के रूप में देखा जाता है।
भारत के कई देशों के साथ मुक्त व्यापार समझौते नीतिगत स्तर पर आने वाले समय में काफी अहम साबित होने वाले हैं और उसके परिणामों को लेकर अभी से उत्सुकता है। इस संदर्भ में प्रधानमंत्री ने हाल ही में यूरोपीय संघ के साथ समझौतों का उल्लेख करते हुए कहा कि जब कोई विकसित देश किसी विकासशील देश के साथ अपनी पहल से समझौता करता है, तो यह अर्थजगत के लिए एक बड़ा संदेश है।
इनमें ‘सभी समझौतों की जननी’ माने जाने वाले यूरोपीय संघ के सत्ताईस देशों के साथ एकमुश्त समझौता हुआ है। इसी को अहम मानते हुए प्रधानमंत्री ने एक नई वैश्विक व्यवस्था और उसमें भारत की खास जगह बनने का संकेत दिया।
इसके अलावा, दुनिया के कई समृद्ध देशों में बढ़ती बुजुर्ग आबादी गंभीर चिंता का एक कारण बन रही है। ऐसे में भारत अपनी युवा आबादी के बूते बेहतर भविष्य की उम्मीद कर रहा है। प्र्रधानमंत्री ने भी इसे दर्ज किया कि विश्व का भारत के प्रति आकर्षण बढ़ा है और हमारे पास युवा प्रतिभाएं हैं, जिनके पास संकल्प, सपने और सामर्थ्य हैं।
जाहिर है, बहस, विचार और टकराव के मुद्दों के समांतर विपक्ष की अनुपस्थिति के बीच प्रधानमंत्री के इस संबोधन पर लोकतांत्रिक संदर्भों में भी विचार किया जाएगा।
