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वादी में वादा

प्रधानमंत्री के रूप में नरेंद्र मोदी का जम्मू-कश्मीर का यह चौथा दौरा था। इस दौरे का संदेश साफ था कि राज्य के विकास में केंद्र अपनी तरफ से मदद करने में कोई कसर नहीं रखेगा..

Author नई दिल्ली | November 8, 2015 21:22 pm
भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी। (पीटीआई फोटो)

प्रधानमंत्री के रूप में नरेंद्र मोदी का जम्मू-कश्मीर का यह चौथा दौरा था। इस दौरे का संदेश साफ था कि राज्य के विकास में केंद्र अपनी तरफ से मदद करने में कोई कसर नहीं रखेगा। जम्मू-कश्मीर सुरक्षा के लिहाज से भारत का सर्वाधिक संवेदनशील राज्य रहा है। फिर, राष्ट्रपति या प्रधानमंत्री का दौरा हो, तो सावधानी और सुरक्षा-तैयारी चरम पर होती है। लेकिन इस बार प्रधानमंत्री के आगमन पर वहां अपेक्षाएं भी चरम पर थीं। शायद इसलिए कि राज्य के लोगों को पहले से अंदाजा था कि इस अवसर पर प्रधानमंत्री विकास की बाबत कुछ बड़ी घोषणा करेंगे। वही हुआ। प्रधानमंत्री ने राज्य के लिए अस्सी हजार करोड़ रुपए के पैकेज का एलान किया। उन्होंने बगलिहार में साढ़े चार सौ मेगावाट की जलविद्युत परियोजना तथा राष्ट्रीय राजमार्ग 44 के उधमपुर-रामबन और रामबन-बनिहाल खंड की आधारशिला रखी। श्रीनगर के शेर-ए-कश्मीर स्टेडियम में जनसभा को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री ने कहा कि इस मदद को पूर्ण विराम मत समझिए, यह तो शुरुआत है।

लेकिन मोदी भी जानते हैं कि कश्मीरियों का भरोसा जीतने के लिए पैकेज और परियोजनाएं काफी नहीं हैं। लोगों के दिल भी छूने होंगे। उन्होंने कई तरह से भावनात्मक तार जोड़ने की कोशिश की। उन्होंने राज्य के मशहूर क्रिकेट खिलाड़ी परवेज रसूल का जिक्र किया और राज्य में अंतरराष्ट्रीय किक्रेट मैच कराने की उम्मीद जगाई। अटल बिहारी वाजपेयी के कश्मीरियत, जम्हूरियत और इंसानियत के नारे का हवाला दिया और कहा कि हम इसे लेकर आगे बढ़ेंगे; कश्मीरियत के बिना हिंदुस्तान अधूरा है। मोदी का यह कश्मीर दौरा इसलिए भी मायने रखता है कि राज्य में पीडीपी और भाजपा की साझा सरकार है। जब यह गठबंधन बना तो इसे राजनीतिक विरोधाभास का नायाब उदाहरण माना गया। आठ महीने से ज्यादा वक्त बीतने के बाद भी गठबंधन सहज नहीं हो पाया है। लेकिन शुरू में पैदा हुए विवादों के बरक्स देखें तो अब इसमें व्यावहारिकता और स्थिरता के लक्षण दिखते हैं।

पिछले विधानसभा चुनाव में मोदी ने बाढ़ से हुई तबाही और उस दौरान उमर अब्दुल्ला सरकार के निकम्मेपन को बड़ा मुद्दा बनाया था। लेकिन अब जबकि केंद्र और राज्य के बीच राजनीतिक तालमेल पहले से अधिक है, बाढ़-राहत के तौर पर घोषित की गई सहायता राशि बहुत-से पीड़ितों तक अब भी नहीं पहुंच सकी है। इस अनुभव को देखते हुए यह रेखांकित करना जरूरी है कि विकास-पैकेज से लोग तभी उत्साहित होंगे जब उन्हें जमीनी फर्क महसूस होगा। प्रधानमंत्री का यह दौरा ऐसे वक्त हुआ, जब घाटी में सुरक्षा की दृष्टि से हालात थोड़े सुधरे हैं। पिछले दिनों लश्कर-ए-तैयबा का जम्मू-कश्मीर में सक्रिय कमांडर सुरक्षा बलों के हाथों मारा गया। घुसपैठ की अनेक साजिशें नाकाम कर दी गर्इं। लेकिन यह नहीं भूलना चाहिए कि इस साल नियंत्रण रेखा पर पाकिस्तान की तरफ से संघर्ष विराम के उल्लंघन की घटनाएं पिछले साल से ज्यादा हुई हैं। कश्मीर के लोग खासकर युवा रोजगार के नए अवसर और जीवन-स्तर में बढ़ोतरी चाहते हैं। इसलिए विकास के मद में केंद्र की मदद उन्हें लुभा सकती है। फिर भी यह मान लेना सही नहीं होगा कि वे अलगाववादियों के असर में नहीं आएंगे। इसके लिए अलग से भी कुछ करने की दरकार है।

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