किसी भी समाज और देश में अगर बुजुर्गों का जीवन मुश्किलों तथा चुनौतियों से दो-चार हो, तो यह न केवल वहां के कल्याण कार्यक्रमों में उनके हित से जुड़े प्रावधानों की विफलता है, बल्कि एक तरह से सामाजिक संवेदनाओं पर भी सवाल है।

अंदाजा इससे लगाया जा सकता है कि परिवार से उपेक्षित बुजुर्ग जब किसी वृद्धाश्रम में पहुंचा दिए जाते हैं, तो वहां भी उन्हें कई तरह की परेशानियों का सामना करना पड़ता है। आमतौर पर वृद्धाश्रमों में भी उनकी देखभाल को लेकर जैसी उपेक्षा या उदासीनता बरती जाती है, वह बुजुर्गों के प्रति समूचे समाज के रवैये में गिरावट का उदाहरण है।

शायद यही वजह है कि सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को देश के सभी राज्यों को यह निर्देश दिया है कि वे वृद्धाश्रमों की स्थापना और वरिष्ठ नागरिकों को उपलब्ध कराई जा रही सुविधाओं की स्थिति के बारे में ताजा रिपोर्ट दाखिल करें। शीर्ष अदालत दरअसल करीब दस साल पहले दायर उस जनहित याचिका पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें बुजुर्गों के कल्याण और संरक्षण के उपायों को प्रभावी ढंग से लागू करने का अनुरोध किया गया है।

कहने को भारतीय समाज में बुजुर्गों को बेहद सम्मानजनक स्थान प्राप्त है। ज्यादातर परिवारों में कमोबेश उनका इतना खयाल जरूर रखा जाता है, ताकि वे अपना जीवन संतोषजनक तरीके से गुजार सकें। हालांकि ऐसे लोग भी हैं, जो घर के वृद्धों की खुशी और सेहत के लिए हर संभव कोशिश करते हैं।

कई बुजुर्ग अगर लंबी उम्र तक जी पाते हैं या अपना आखिरी दौर खुशी और संतोष के साथ बिता पाते हैं, तो उसमें उनका खयाल रखने वाली संतानों की बड़ी भूमिका होती है। मगर इसके बरक्स ऐसे लोग भी होते हैं, जो माता-पिता या घर के किसी भी बुजुर्ग को बोझ मानने लगते हैं। कई दंपति सिर्फ इसलिए माता-पिता से अलग रहने लगते हैं, ताकि उनकी सुविधाजनक जिंदगी में कोई दखल न हो।

ऐसे लोग भूल जाते हैं कि अपनी संतान को जन्म देने से लेकर उन्हें पाल-पोस कर बड़ा करने और अपने बूते खड़ा होने लायक बनाने के लिए माता-पिता ने अपने सारे सुख की अनदेखी करके अपना पूरा जीवन झोंक दिया होता है।

इसके बावजूद ऐसी नौबत क्यों आती है कि एक सुरक्षित स्थिति में जाते ही कुछ लोग माता-पिता को अपने हाल पर अकेले रहने के लिए छोड़ देते हैं। यहां तक कि किसी बीमारी से उपजी पीड़ा और बच्चों के प्रति उनकी संवेदनात्मक भूख का भी खयाल रखना जरूरी नहीं समझते। कई परिवार घर में बुजुर्गों की देखभाल नहीं करने या उपेक्षा करने से आगे जाकर उन्हें किसी ऐसे वृद्धाश्रम में पहुंचा देते हैं, जहां वे अपने जीवन का बचा हुआ वक्त किसी तरह काटते हैं।

इस संदर्भ में उन कानूनी तकाजों का भी खयाल रखना जरूरी नहीं समझा जाता, जिनमें माता-पिता या बुजुर्गों की देखभाल को लेकर संतानों की कुछ जिम्मेदारी तय की गई है। ऐसा शायद इसलिए भी संभव हो पाता है कि बहुत कम माता-पिता अपने प्रति संवेदनहीन हो जाने वाली संतानों को अदालत के कठघरे में खड़ा करके अपना खयाल रखे जाने का अधिकार मांगते हैं।

सरकारी कल्याण कार्यक्रमों की हालत यह है कि वृद्धावस्था पेंशन या कुछ अन्य सहायता देने के दावे तो किए जाते हैं, लेकिन व्यवहार में उनसे बुजुर्गों को कितना लाभ मिलता है, इसकी सुधि लेने की जरूरत नहीं समझी जाती। परिवारों से उपेक्षित बुजुर्गों के लिए वृद्धाश्रम एक विकल्प जरूर है, लेकिन वहां संवेदना, संरक्षण और सम्मानजनक वातावरण सुनिश्चित कराना सरकार की ही जिम्मेदारी है।

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