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अर्थव्यवस्था की तस्वीर

कई क्षेत्रों में विदेशी निवेश की सीमा बढ़ाने की घोषणा के दूसरे ही रोज अर्थव्यवस्था का हाल बताने वाले दो खास आंकड़े आए। एक, खुदरा महंगाई में बढ़ोतरी के, और दूसरे, औद्योगिक उत्पादन..
Author नई दिल्ली | November 13, 2015 21:39 pm

कई क्षेत्रों में विदेशी निवेश की सीमा बढ़ाने की घोषणा के दूसरे ही रोज अर्थव्यवस्था का हाल बताने वाले दो खास आंकड़े आए। एक, खुदरा महंगाई में बढ़ोतरी के, और दूसरे, औद्योगिक उत्पादन की वृद्धि दर घटने के। ये दोनों आंकड़े इसी ओर इशारा करते हैं कि घरेलू मोर्चे पर सरकार को कहीं ज्यादा ध्यान देने की जरूरत है। महंगाई पर काबू पाना भाजपा का एक खास वादा था। अगर कोई साल भर तक इस मामले में अपेक्षया राहत रही, तो इसका श्रेय अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में आई भारी गिरावट को जाता है। भारत अपनी जरूरत का तीन चौथाई कच्चा तेल आयात करता है। लेकिन अब महंगाई के मामले में राहत का दावा सरकार नहीं कर सकती। उपभोक्ता मूल्य सूचकांक पर आधारित खुदरा महंगाई दर में बढ़ोतरी का रुझान दर्ज हुआ है। सितंबर में खुदरा महंगाई दर 4.41 फीसद थी, जो अक्तूबर में बढ़ कर पांच फीसद हो गई। गरीब परिवारों के खर्च का अधिकांश हिस्सा सबसे बुनियादी जरूरत यानी खाद्य पदार्थों से ताल्लुक रखता है।

गौरतलब है कि अक्तूबर में खुदरा खाद्य महंगाई दर और भी अधिक रही, सवा पांच फीसद। गौर करने की दूसरी बात यह है कि अक्तूबर में खुदरा महंगाई ग्रामीण भारत में अधिक रही, बनिस्बत शहरी इलाकों के। ग्रामीण क्षेत्रों में यह करीब साढ़े पांच फीसद रही, जबकि शहरी क्षेत्रों में करीब सवा चार फीसद। सबसे ज्यादा बढ़ोतरी दाल की कीमतों में दर्ज हुई है। यह सही है कि जनसंख्या वृद्धि के बरक्स दलहन का रकबा घटा है। पर एक साल में दालों की कीमतों में बयालीस फीसद की बढ़ोतरी बाजार के खेल की ओर भी इशारा करती है। जब भी महंगाई का मसला उठता है, केंद्र गेंद राज्यों के पाले में डालने की कोशिश करता है। राज्यवार आंकड़े देखें। बाईस राज्यों के आंकड़े जारी हुए हैं। इनमें से जिन ग्यारह राज्यों में खुदरा महंगाई दर राष्ट्रीय औसत से अधिक है उनमें से छह राज्य राजग-शासित हैं।

अर्थव्यवस्था की सूरत बताने वाले दूसरे आंकड़े औद्योगिक उत्पादन के हैं। अगस्त में जोरदार बढ़ोतरी के बाद सितंबर में औद्योगिक उत्पादन पटरी से उतर गया। सितंबर में इसकी वृद्धि दर 3.6 फीसद रही, जो कि पिछले चार महीनों का सबसे निचला स्तर है। आइआइपी यानी औद्योगिक उत्पादन सूचकांक में करीब तीन चौथाई हिस्सा मैन्युफैक्चरिंग यानी विनिर्माण का होता है और खेती के बाद यह रोजगार का सबसे बड़ा स्रोत है। मैन्युफैक्चरिंग में वृद्धि दर अगस्त में 6.6 फीसद थी।

सितंबर में इसमें चार फीसद की गिरावट आ गई। अलबत्ता पूंजीगत सामान और टिकाऊ उपभोक्ता सामान के मामले में जरूर दो अंक की वृद्धि दर दर्ज हुई है। पर यह दावा करना मुश्किल है कि यह निवेश और मांग में बढ़ोतरी का टिकाऊ रुझान है। त्योहारी सीजन के कारण सितंबर के बाद अक्तूबर के आंकड़ों में भी यह प्रवृत्ति बनी रह सकती है। उसके बाद भी यह कायम रहे तभी निवेश और मांग की सुस्ती टूटने का दावा किया जा सकेगा। महंगाई बढ़ने और औद्योगिक उत्पादन की वृद्धि दर घटने के साथ-साथ सरकारी बैंकों का एनपीए बढ़ने की भी खबर आई। सरकारी बैंकों का एनपीए दस साल के उच्चतम स्तर पर पहुंच गया है। बिहार चुनाव से खाली होते ही प्रधानमंत्री ने अर्थव्यवस्था की सुनहरी तस्वीर पेश की। क्या सचमुच सब कुछ वैसा ही है!

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