पश्चिम एशिया में संघर्ष समाप्त होने के आसार नजर नहीं आ रहे हैं, जिस कारण ऊर्जा संकट दिनोंदिन गहराता जा रहा है। इसी का नतीजा है कि सोमवार को पेट्रोल-डीजल की कीमतों में फिर से इजाफा कर दिया गया। पेट्रोल के दाम में 2.61 रुपये और डीजल में 2.71 रुपये प्रति लीटर की बढ़ोतरी की गई है। पिछले दो हफ्तों से भी कम समय में यह चौथी बार की गई वृद्धि है।

खबरों के मुताबिक, सार्वजनिक क्षेत्र की तेल विपणन कंपनियां अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों के साथ उसके खुदरा दाम बढ़ा रही हैं। मगर सवाल सिर्फ कच्चे तेल के दामों में बढ़ोतरी का नहीं है, बल्कि इस बात का भी है कि सरकार इस संकट से निपटने के लिए वैकल्पिक उपायों पर कितनी तेजी और गंभीरता से काम कर रही है।

बार-बार ईंधन की कीमतें बढ़ने से स्पष्ट है कि आने वाले दिनों में माल ढुलाई की लागत भी बढ़ेगी, जिससे जरूरी वस्तुएं महंगी होंगी। ऐसे में पहले से ही आर्थिक कठिनाइयों का सामना कर रहे आम लोगों पर महंगाई का अतिरिक्त बोझ पड़ेगा।

दरअसल, फरवरी के अंत से अब तक वैश्विक कच्चे तेल की कीमतों में पचास फीसद से अधिक की बढ़ोतरी हुई है। इसका मुख्य कारण पश्चिम एशिया में तनाव और होर्मुज जलमार्ग को अवरुद्ध करने से तेल आपूर्ति का बाधित होना है।

सरकार ने संघर्ष शुरू होने के बाद तकरीबन ढाई महीने तक तेल के दामों को स्थिर रखने का प्रयास किया, लेकिन तेल कंपनियों पर बढ़ते आर्थिक दबाव की वजह से अब स्थिति नियंत्रण से बाहर होती दिख रही है।

हालांकि सरकार यह दावा करती रही है कि वैश्विक संकट के बीच ऊर्जा के वैकल्पिक स्रोत तैयार किए जा रहे हैं, लेकिन बीते करीब दो सप्ताह से पेट्राल-डीजल और सीएनजी के दाम में जिस तरह से लगातार बढ़ोतरी हुई है, उससे सरकार के प्रयास सफल होते नजर नहीं आ रहे हैं।

इसका सबसे ज्यादा असर समाज के उस वर्ग पर पड़ेगा, जो आर्थिक रूप से कमजोर है और अपनी बुनियादी जरूरतों को पूरा करने के लिए दिन भर संघर्ष करता है। इससे पहले कि स्थिति और ज्यादा बिगड़े, सरकार को ऊर्जा संकट पर काबू पाने के वैकल्पिक रास्ते तैयार करने होंगे और महंगाई से निपटने के लिए ठोस कदम उठाने होंगे।