Jansatta Editoral: कोई भी संवेदनशील और प्रगतिशील समाज अपने बीच जड़ें जमाए वैसी धारणाओं से लड़ता है, जिनका खमियाजा महिलाओं या कमजोर तबकों को उठाना पड़ता है। मगर यह विचित्र है कि हमारे देश में कुछ ऐसे प्रश्न आज भी सामाजिक विकास में एक बाधा बने हुए हैं, जिनका सीधा संबंध स्त्रियों की सेहत और गरिमा के साथ जुड़ा हुआ है।

मासिक धर्म या माहवारी मूलत: महिलाओं या लड़कियों के स्वास्थ्य से जुड़ा सवाल है, लेकिन कई तरह की पितृसत्तात्मक सोच के कारण उसे संकोच का विषय बना दिया गया है। इसकी वजह से सामान्य जीवन में लड़कियों को बहुस्तरीय मुश्किलों का सामना करना पड़ता है, इससे उनका स्वास्थ्य और व्यक्तित्व प्रभावित होता है।

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सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को इसी संदर्भ में एक अहम हस्तक्षेप किया है और मासिक धर्म से जुड़े स्वास्थ्य को संविधान के तहत जीवन और गरिमा के अधिकार का हिस्सा बताया। शीर्ष अदालत की यह टिप्पणी बेहद अहम है कि मासिक धर्म स्वच्छता प्रबंधन उपायों की अनुपलब्धता एक लड़की की गरिमा को कम करती है, क्योंकि गरिमा उन परिस्थितियों में व्यक्त होती है, जो लोगों को अपमान, बहिष्कार या अनावश्यक पीड़ा के बिना बाहर निकलने में सक्षम बनाती है।

यह छिपा नहीं है कि महिलाओं और लड़कियों के स्वास्थ्य से जुड़ी माहवारी को लेकर समाज में कैसी मिथकें मौजूद रही हैं। इसकी वजह से घर से लेकर बाहर या कार्यस्थलों पर महिलाओं को कई तरह की असुविधाजनक स्थितियों का सामना करना पड़ता है। सैनिटरी पैड की उपलब्धता हर जगह नहीं होने की वजह से समस्या और बढ़ जाती है। इसके अलावा, स्कूलों में शौचालयों की स्थिति भी जगजाहिर रही है।

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अनेक अध्ययनों में ऐसे तथ्य सामने आते रहे हैं कि स्कूलों में स्वच्छ शौचालय की सुविधा न होने की वजह से बहुत सारी लड़कियों को बीच में ही अपनी पढ़ाई छोड़नी पड़ती है। यही वजह है कि शीर्ष अदालत ने देश के सभी सरकारी और निजी स्कूलों को लड़कियों को जैविक रूप से अपघटनीय सैनिटरी पैट निशुक्ल बांटने के साथ-साथ लड़के और लड़कियों के लिए अलग-अलग शौचालय बनाने का निर्देश दिया।

व्यवस्था संबंधी समस्याओं को दूर किए जाने के साथ-साथ इस मसले पर समाज और खासतौर पर पुरुषों को सोच के स्तर पर ज्यादा संवेदनशील बनाने की जरूरत है।

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