per capita ejection of plastic waste is rising instead of decreasing in India - संपादकीयः मुसीबत की थैली - Jansatta
ताज़ा खबर
 

संपादकीयः मुसीबत की थैली

हाल ही में देश के साठ बड़े शहरों में कराए गए अध्ययन में यह तथ्य सामने आया कि वहां से चार हजार टन से ज्यादा प्लास्टिक कचरा निकलता है। जबकि देश के बाकी हिस्सों से प्रतिदिन निकलने वाले प्लास्टिक कचरे की मात्रा पच्चीस हजार नौ सौ चालीस टन है।

Author August 7, 2018 3:06 AM
यूपी प्लास्टिक और अन्य जीव अनाशित कूड़ा-कचरा (विनियमन) अधिनियम 2000 के तहत योजना का पहला चरण 15 जुलाई से लागू हो चुका है।

देश में प्लास्टिक के चलते होने वाले प्रदूषण और उससे पर्यावरण पर बढ़ते जोखिम के मसले पर लंबे समय से चिंता जताई जाती रही है। पिछले कई सालों से इससे निपटने के लिए उपाय करने के तमाम दावे भी किए जाते रहे हैं। लेकिन आज भी अगर देश में कुल प्लास्टिक कचरे का चालीस फीसद हिस्सा जल और जमीन के लिए मुसीबत बन रहा है तो यह इस समस्या के लिए जताई जाने वाली चिंता के मुकाबले इससे निपटने के दावों पर एक सवालिया निशान है। पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय की ओर से संसद में पेश आंकड़ों के मुताबिक देश में प्लास्टिक कचरे के साठ फीसदी हिस्से का ही समय पर पुनर्चक्रण हो पा रहा है, बाकी चालीस फीसद हिस्सा जलाशयों और जमीन को बुरी तरह दूषित कर रहा है। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की एक रिपोर्ट में भी यह कहा गया है कि देश में प्लास्टिक कचरे का प्रति व्यक्ति उत्सर्जन रोजाना बढ़ रहा है। हाल ही में देश के साठ बड़े शहरों में कराए गए अध्ययन में यह तथ्य सामने आया कि वहां से चार हजार टन से ज्यादा प्लास्टिक कचरा निकलता है। जबकि देश के बाकी हिस्सों से प्रतिदिन निकलने वाले प्लास्टिक कचरे की मात्रा पच्चीस हजार नौ सौ चालीस टन है। इसमें से करीब आधा हिस्सा या तो नालों के जरिए जलाशयों में चला जाता है या फिर गैरशोधित रूप में किसी भूखंड पर पड़ा रहता है और आसपास की जमीन को प्रदूषित करता रहता है।

अंदाजा लगाया जा सकता है कि जल और जमीन को प्रदूषित करके समूची पृथ्वी के सामने एक चुनौती खड़ी करने में उस प्लास्टिक का हिस्सा कितना बड़ा हो चुका है, जो हमारी रोजमर्रा की जरूरतों का अभिन्न हिस्सा बन चुका है। मुश्किल यह है कि इससे पैदा संकट के बारे में ज्यादातर लोगों को जानकारी है, उसकी समस्या से भी दो-चार होना पड़ता है, लेकिन न तो आम लोगों को इसके उपयोग से बचना जरूरी लगता है, न सरकारें इसके उत्पादन और इस्तेमाल को नियंत्रित करने या इस पर पूरी तरह पाबंदी लगाने जैसा कोई ठोस कदम उठाती हैं। सरकार का कहना है कि पुनर्चक्रण के बाद नई तकनीकों के जरिए प्लास्टिक के इस्तेमाल को सड़क निर्माण, सीमेंट भट्टियों और भवन निर्माण में बढ़ावा दिया जा रहा है। लेकिन अगर कुल कचरे में से चालीस फीसद हिस्से को सड़कों और नालियों में गंदगी फैलाने के लिए छोड़ दिया जाता है या भारी तादाद में प्लास्टिक समुद्र में पहुंच कर समुद्री जीवन को भी संकट में डाल रहा है तो इसकी जिम्मेदारी किस पर आती है?

अलग-अलग राज्यों में प्लास्टिक के उपयोग पर पाबंदी लगाने की घोषणाएं होती रही हैं। लेकिन व्यवहार में उस पर अमल को लेकर शायद ही कभी सख्ती बरती जाती है। पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय ने प्लास्टिक कचरा प्रबंधन नियम, 2016 के तहत पचास माइक्रोन से कम आकार की प्लास्टिक थैलियों और अन्य उत्पादों पर प्रतिबंध लगाए हैं। कहने को ये नियम इक्कीस राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में लागू हैं। लेकिन नियमों की कसौटी उस पर अमल सुनिश्चित करना है। यह छिपी बात नहीं है कि देश के ज्यादातर हिस्सों में प्लास्टिक का कचरा एक बड़ी समस्या बन चुका है तो इसकी वजह इसके उत्पादन, बिक्री और इस्तेमाल को लेकर संबंधित महकमों का लापरवाह रवैया है। एक अध्ययन रिपोर्ट के मुताबिक उत्पादन और उपयोग के बरक्स जिस तरह प्लास्टिक कचरे के शत-प्रतिशत निस्तारण, पुनर्चक्रण और शोधन के मामले में ढिलाई बरती जा रही है, वह आने वाले दिनों में एक विषैला टाइम बम साबित हो सकता है। सवाल है कि इस व्यापक विनाश की जमीन तैयार होते जाने की चुनौती से निपटने को लेकर सरकार के पास क्या योजना है?

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ गूगल प्लस पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App