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संपादकीय: रोग बनाम रोगी

लोगों में कोरोना संक्रमण का भय है और वे ऐसे किसी व्यक्ति से दूरी बना कर रखना चाहते हैं, जिसकी पहचान संक्रमित के रूप में हो चुकी है। मगर यह भी तथ्य है कि अगर जरूरी सावधानी बरती जाए, तो संक्रमण का खतरा टल जाता है। इसलिए पहचाने गए रोगी के प्रति उपेक्षापूर्ण व्यवहार करना मानवीय दृष्टि से किसी भी तरह उचित नहीं कहा जा सकता।

COVID-19तस्वीर का इस्तेमाल केवल प्रतीकात्मक रूप से किया गया है। (PTI)

सरकार लगातार अपील कर रही है कि हमें बीमारी से लड़ना है, बीमार से नहीं, इसलिए किसी के साथ भेदभाव न करें। किसी को फोन करो तो मोबाइल में पहले यही संदेश सुनाई देता है। मगर हैरानी की बात है कि लोगों पर इसका अपेक्षित असर नहीं पड़ रहा। सरकार ने नियम बनाया है कि जो लोग घरों में पृथकवास पर हैं, उन्हें प्रशासन हर मदद मुहैया कराएगा, जरूरत की सारी चीजें उन्हें उपलब्ध कराई जाएंगी। मगर इसका भी पालन नहीं हो रहा।

दिल्ली के एक मुहल्ले में एक कोरोना संक्रमित परिवार को घर में ही पृथकवास में रखा गया है। कोरोना संक्रमण रोकने के लिए तैनात इस परिवार का मुखिया खुद संक्रमित हो गया और फिर उसके परिवार के दूसरे लोगों में यह संक्रमण फैल गया। अब पृथकवास में रहते हुए उन्हें प्रशासन की उपेक्षा का सामना करना पड़ रहा है। इस परिवार की ऊपरी मंजिल पर रहने वाला परिवार उन्हें रस्सी में थैली बांध कर कुछ जरूरी चीजें मुहैया करा देता है, तो काम चल जाता है। पड़ोसी उनके बच्चों के लिए कुछ भेज देते हैं। इस तरह उन्हें रोजमर्रा की चीजों के लिए भी ऐसी दया पर निर्भर रहना पड़ता है।

स्वाभाविक ही लोगों में कोरोना संक्रमण का भय है और वे ऐसे किसी व्यक्ति से दूरी बना कर रखना चाहते हैं, जिसकी पहचान संक्रमित के रूप में हो चुकी है। मगर यह भी तथ्य है कि अगर जरूरी सावधानी बरती जाए, तो संक्रमण का खतरा टल जाता है। इसलिए पहचाने गए रोगी के प्रति उपेक्षापूर्ण व्यवहार करना मानवीय दृष्टि से किसी भी तरह उचित नहीं कहा जा सकता।

आखिर अस्पतालों में स्वास्थ्यकर्मी भी तो कोरोना संक्रमितों का इलाज कर रहे हैं, पुलिसकर्मी और चिकित्सा वाहन चलाने वाले आदि भी ऐसे रोगियों की मदद के लिए तैनात हैं। उनमें से बहुत सारे लोग ऐसे रोगियों के संपर्क में आने से संक्रमित हो रहे हैं, फिर उनके उनके परिवार वालों में संक्रमण फैल रहा है। दिल्ली में जिस व्यक्ति के परिवार को पृथकवास में उपेक्षापूर्ण स्थितियों से गुजरना पड़ रहा है, वह भी कोरोना मरीजों की मदद के लिए तैनात था। विचित्र है कि जब तक वह अपनी जिम्मेदारी निभाता रहा, तब तक उसे कोरोना योद्धा के रूप में पहचाना जाता था, पर संक्रमित होते ही वह उपेक्षित हो गया!

एकांतवास शिविरों में रखे गए लोगों के प्रति सरकारी अमले की उपेक्षा के कई मामले सामने आ चुके हैं। इसकी वजह से कई जगह कुछ मरीज पलायन तक कर गए। प्रशासन का वही रवैया अपने घरों में पृथकवास पर रखे गए लोगों के साथ भी देखा जा रहा है। ऐसे लोगों के घरों के बाहर प्रशासन ताला लगा देता है। वे वहां से निकल नहीं सकते। नियम है कि प्रशासन के लोग इन परिवारों को जरूरत की चीजें लाकर देंगे, पर संक्रमण का भय कहें, लापरवाही या घृणा का भाव, सरकारी अमला उनकी सुध लेने नहीं पहुंच रहा। इस तरह संक्रमितों के शीघ्र स्वस्थ होने को लेकर भी आशंका पैदा होती है।

कोरोना से लड़ने का सरकारी संकल्प अगर जमीनी स्तर पर इस तरह दिखाई दे रहा है, तो इसमें कितनी कामयाबी मिलेगी, कहना मुश्किल है। संक्रमितों के संपर्क में आने से बचने के लिए निजी सुरक्षा उपकरण मुहैया कराए गए हैं, एहतियाती उपाय किए गए हैं, इसके बावजूद अगर कोरोना से लड़ने के लिए तैनात सरकारी अमला खुद मरीजों से भेदभाव औेर उपेक्षापूर्ण व्यवहार करता है, तो अपराध है।

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