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संपादकीय: अभाव बनाम दायित्व

इसके समांतर दूसरी समस्या पूर्णबंदी के साथ जुड़ी है, जिसमें अब जाकर भले धीरे-धीरे राहत मिल रही है, लेकिन पिछले करीब छह महीने के दौरान इसका अर्थव्यवस्था पर जो असर पड़ा है, उसमें एक बड़ी आबादी ऐसी है जिसकी माली हालत बिगड़ी है।

unemployment in indiaजून के बाद से देश में बढ़ना शुरू हुए रोजगार।

मौजूदा समय में महामारी का सामना करने के मामले में देश भर के अस्पतालों में काम कर रहे डॉक्टर किन चुनौतियों से जूझ रहे हैं, यह किसी से छिपा नहीं है। घर-परिवार की फिक्र के बजाय फिलहाल वे एक तरह की आपात स्थितियों में कोरोना संक्रमण के बीच मरीजों के इलाज के लिए अपनी ओर से हर संभव कोशिश कर रहे हैं। इसके समांतर दूसरी समस्या पूर्णबंदी के साथ जुड़ी है, जिसमें अब जाकर भले धीरे-धीरे राहत मिल रही है, लेकिन पिछले करीब छह महीने के दौरान इसका अर्थव्यवस्था पर जो असर पड़ा है, उसमें एक बड़ी आबादी ऐसी है जिसकी माली हालत बिगड़ी है।

नौकरियां और व्यवसाय गंवाने वाले सभी तबके के लोग इस मुश्किल को झेल रहे हैं। लेकिन उत्तरी दिल्ली नगर निगम के तहत आने वाले बाड़ा हिंदूराव अस्पताल में वेतन पर निर्भर डॉक्टरों और अस्पताल के अन्य चिकित्सा कर्मचारियों की समस्या भी इसलिए लगातार गंभीर होती गई है, क्योंकि उन्हें पिछले तीन महीनों से वेतन नहीं मिला है। बाजार की हालत, बेलगाम महंगाई, बढ़ते खर्च के बीच अगर तीन महीनों से किसी को वेतन नहीं मिल रहा हो तो उसकी स्थिति समझी जा सकती है।

शायद यही वजह है कि मजबूरन अस्पताल के सभी रेजीडेंट डॉक्टर पिछले करीब तेईस दिनों से हड़ताल पर हैं। विडंबना यह है कि अस्पताल प्रशासन की नजर में शायद डॉक्टरों की मांग की अहमियत बहुत ज्यादा नहीं है और वह इस पर टालमटोल का रवैया अख्तियार किए हुए है। इस अनदेखी के बीच अब इंडियन मेडिकल एसोसिएशन यानी आइएमए ने भी खुल कर डॉक्टरों की हड़ताल की समर्थन किया है। इस मसले पर आइएमए ने यहां तक कहा दिया कि जिस तरह से शासन हो रहा है, उसमें कुछ गड़बड़ है और यह शासन का नया निचला स्तर है; स्वास्थ्यकर्मी और खासतौर पर डॉक्टर राष्ट्रीय संपदा हैं और वेतन रोक कर उनका अपमान करना और कुछ नहीं, बल्कि ‘राज्य प्रायोजित हिंसा’ है!

अंदाजा लगाया जा सकता है कि इस मसले पर डॉक्टरों की नाराजगी का आलम क्या है! यह स्थिति तब है जब सुप्रीम कोर्ट भी कह चुका है कि डॉक्टरों और स्वास्थ्यकर्मियों का वेतन समय पर दिया जाए। सवाल है कि इसके बावजूद अस्पताल प्रशासन का रुख ऐसा क्यों बना हुआ है! लगातार अभाव और जोखिम के बीच काम कर रहे डॉक्टरों पर इसका क्या असर पड़ेगा?

जब शुरुआती दिनों में कोरोना के संक्रमण से बचाव के लिए समूचे देश में पूर्णबंदी लागू हुई थी तब देश की सरकार के आह्वान पर समूचे देश में डॉक्टरों के प्रति लोगों ने अलग-अलग तरीकों से सम्मान जाहिर किया था। इसके बाद सरकार ने डॉक्टरों की सुरक्षा के मद्देनजर एक विशेष व्यवस्था भी की। लेकिन ऐसी पहलकदमियों के बजाय जमीनी हकीकत अगर उतनी ही सुखद नहीं है तो इसे किस तरह देखा जाएगा!

इसमें कोई शक नहीं है कि देश अभी जिस संवेदनशील दौर से गुजर रहा है, इसमें कोरोना के संक्रमण से उपजी परिस्थिति ही सबसे बड़ी चुनौती है। इस चुनौती का सामना करना पूरी तरह डॉक्टर और स्वास्थ्यकर्मियों के भरोसे पर निर्भर है, इसलिए उनका दायित्व भी बड़ा है। लेकिन अगर उनकी अनिवार्य आर्थिक जरूरतों की उपेक्षा की जाए तो उनके मनोबल को कब तक बनाए रखा जा सकता है!

देश में पहले ही आबादी और जरूरत के मुताबिक डॉक्टरों की भारी कमी है। डॉक्टरों के बीच से एक बड़ा तबका निजी क्षेत्र में चला जाता है। ऐसे में न्यूनतम सुविधाओं, संसाधनों और कोरोना जैसी महामारी के जोखिम के बीच अगर डॉक्टर अपनी सेवा देने को तैयार हैं तो अस्पताल प्रशासन को भी डॉक्टरों की मांगों पर गंभीरता से विचार करना चाहिए।

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