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दंड बनाम दायित्व

मृत्युदंड को लेकर सर्वोच्च न्यायालय का रुख मानवीय है।

दंड बनाम दायित्व
सांकेतिक फोटो।

जघन्यतम अपराध के मामलों में हमारे यहां मृत्युदंड का प्रावधान है। मगर इस विधान को समाप्त करने की मांग लंबे समय से उठती रही है। तर्क दिया जाता है कि मृत्यु के बाद अपराधी के सुधरने की गुंजाइश समाप्त हो जाती है। इसलिए दुनिया के बहुत सारे देशों ने मृत्युदंड का प्रावधान समाप्त कर दिया है। इन तर्कों के आलोक में हमारे यहां भी अदालतें मृत्युदंड सुनाने से पहले अनेक बार विचार करती हैं।

फिर दंड सुनाए जाने के बाद भी उसे चुनौती देने और बार-बार उसके औचित्य पर विचार की भरपूर गुंजाइश छोड़ी गई है। मगर जब अदालतों को सैद्धांतिक रूप से लगता है कि किसी अपराध के लिए कठोरतम सजा मृत्युदंड ही हो सकती है, तभी वे इसका आदेश देती हैं। इस पर अब सर्वोच्च न्यायालय ने फिर से मंथन जरूरी समझा है। एक मामले में मध्य प्रदेश के उच्च न्यायालय ने मृत्यदंड की सजा सुनाई थी।

उसे सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती दी गई थी। तीन जजों की पीठ ने उस पर सुनवाई करने के बाद फैसला सुरक्षित रख लिया था। अब उस पर विचार के लिए पांच जजों की पीठ को भेज दिया गया है। फैसला सुरक्षित रखते हुए शीर्ष अदालत ने कहा था कि मृत्युदंड एक ऐसी सजा है, जिसके बाद दोषी मृत्यु को प्राप्त हो जाता है और उसके मरने के बाद फैसले को किसी भी हाल में पलटा या बदला नहीं जा सकता।

मृत्युदंड को लेकर सर्वोच्च न्यायालय का रुख मानवीय है। अदालत ने यह भी कहा है कि अगर अपराध सिद्धांत के आधार पर अदालत इस नतीजे पर पहुंचती है कि मौत की सजा जरूरी नहीं तो उसे उसी दिन उम्रकैद की सजा देने की आजादी होनी चाहिए। दरअसल, निचली अदालतों और उच्च न्यायालयों के सामने अक्सर यह अड़चन पेश आती है कि वे जघन्यतम अपराधों के लिए कठोरतम सजा के रूप में किसका चुनाव करें, मृत्युदंड या उम्रकैद। कई मामलों में उम्रकैद की सजा अपर्याप्त लगती है।

इसलिए अक्सर दोषियों को ताउम्र कैद की सजा देने की मांग भी उठती रही है। इन तमाम पहलुओं के मद्देनजर अदालतें मृत्युदंड की सजा सुना देती हैं। मगर हकीकत यह भी है कि अनेक ऐसे मामले विचार के लिए लंबे समय तक सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष पड़े रहते हैं। फिर राष्ट्रपति के समक्ष दया याचिका लगाई जाती है। यानी मृत्युदंड अपरिहार्य स्थितियों में ही देने का प्रयास किया जाता है। इसी को देखते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने एक ऐसा दिशा-निर्देश बनाने की जरूरत रेखांकित की है, जिससे सभी अदालतों में समान नियम लागू हो सके।

सर्वोच्च न्यायालय एक ऐसा दिशा-निर्देश चाहता है, जिससे यह तय हो सके कि निचली अदालतों में सुनवाई के दौरान किन परिस्थितियों में और कब मौत की सजा को कम करने पर विचार किया जा सकता है। निस्संदेह इस दिशा-निर्देश से निचली अदालतों को मृत्युदंड की सजा सुनाते समय आसानी होगी। दरअसल, अदालतें भी नहीं चाहतीं कि किसी दोषी से उसके सुधरने की संभावना छीन ली जाए।

मगर लचीला कानून कई बार जघन्यतम अपराधों पर लगाम लगाने में अवरोध पैदा कर सकते हैं, इसलिए मृत्युदंड का प्रावधान समाप्त करने को लेकर हिचक बनी रहती है। पर इस बात की जरूरत से इनकार नहीं किया जा सकता कि मृत्युदंड की सजा सुनाते वक्त मानवीय पहलुओं के साथ-साथ अपराध शास्त्र के विवेकसम्मत पक्षों का भी ध्यान रखा जाए। इस दृष्टि से सर्वोच्च न्यायालय की पहल निस्संदेह सराहनीय है।

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