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पेलोसी का दौरा

पेलोसी के ताइवान दौरे ने वैश्विक राजनीति में एक हलचल तो पैदा कर ही दी।

अमेरिकी प्रतिनिधि सभा की स्पीकर नैंसी पेलोसी का ताइवान दौरा मामूली घटना नहीं है। देखा जाए तो चीन के भारी विरोध और धमकियों के बावजूद पेलोसी का ताइवान पहुंचना अमेरिका की चीन को खुली चुनौती है। जिस कड़ी सुरक्षा के बीच पेलोसी ताइवान पहुंचीं, वह असाधारण थी। चीन की गंभीर नतीजों की धमकियों के मद्देनजर अमेरिकी सेना ने पेलोसी के विमान को चौबीस लड़ाकू विमानों के घेरे के साथ ताइवान में उतरवाया। ऐसा कर अमेरिका ने यह संदेश दे दिया कि वह चीन की धमकियों से डरने वाला नहीं।

इससे भी बड़ा संदेश यह कि ताइवान के मामले में वह पूरी तरह उसके साथ खड़ा है और उसे चीन से बचाने के लिए वह किसी भी हद तक जा सकता है। हालांकि प्रतिक्रिया में चीन के लड़ाकू विमानों ने पेलोसी के दौरे के दौरान ही ताइवान के हवाई क्षेत्र में उड़ान भर विरोध जताया। पेलोसी की ताइवान यात्रा के मुद्दे पर चीन ने अमेरिकी राजदूत को भी तलब कर राजनयिक स्तर पर विरोध दर्ज करवाया। ये सारे घटनाक्रम इस बात की ओर इशारा कर रहे हैं कि ताइवान को लेकर दोनों देशों के बीच टकराव कभी भी गंभीर रूप ले बैठे तो हैरानी नहीं होगी। जाहिर है, इसके नतीजे भी कम गंभीर नहीं होंगे।

इस साल फरवरी में यूक्रेन पर रूस के हमले के बाद से ही इन आशंकाओं को भी बल मिलता दिखा है कि चीन भी रूस के नक्शे-कदम पर बढ़ सकता है और ताइवान पर हमला कर सकता है। हालांकि ताइवान पर हमला चीन के लिए भी उतना आसान है नहीं। चीन भी इसके निहितार्थ समझता है। लेकिन सवाल है कि ताइवान पर कब्जे को लेकर चीन जहां तक बढ़ चुका है, उससे क्या वह अपने कदम खींचेगा? अब तक चीन का जो रुख रहा है और उसकी पूर्वी कमान जिस तरह ताइवान पर हमले के लिए तैयार बैठी है, उससे जरा नहीं लगता कि वह पीछे हटेगा।

वैसे भी खुले तौर पर वह ताइवान को अपना हिस्सा बताता ही रहा है। यह स्थिति गंभीर टकराव वाली है। अगर ताइवान को लेकर जंग छिड़ी, तो यह स्थिति रूस-यूक्रेन संकट से कहीं ज्यादा भयावह साबित हो सकती है। हमला ताइवान पर होगा, पर असली जंग चीन और अमेरिका के बीच होगी। और इसका नतीजा एशिया क्षेत्र में स्थायी अशांति के रूप में देखने को मिल सकता है।

पेलोसी के ताइवान दौरे ने वैश्विक राजनीति में एक हलचल तो पैदा कर ही दी। बड़े देश फिर खेमों में बंट गए। पाकिस्तान ने खुल कर इसका विरोध किया तो आस्ट्रेलिया ने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी। जापान के स्वर भी दबे रहे। रूस चीन के साथ खड़ा है ही। हालांकि अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन खुद भी इस पक्ष में नहीं थे कि पेलोसी अभी ताइवान जातीं। अमेरिकी सेना का विचार भी कुछ ऐसा ही था। लेकिन प्रतिनिधि सभा की स्पीकर की हैसियत से पेलोसी अमेरिकी राजनीति में तीसरी बड़ी ताकतवर नेता हैं। फिर, दो साल बाद अमेरिका में राष्ट्रपति चुनाव पर भी उनकी नजर है।

वे शुरू से चीन की मुखर विरोधी भी रही हैं। ऐसे में बाइडेन उन्हें कैसे रोक पाते? वैसे भी चीन के साथ व्यापार युद्ध और फिर उस पर लगे कोरोना वायरस फैलाने के आरोप के बाद अमेरिका के साथ रिश्तों में और तनाव आया है। यूक्रेन में रूस को रोक पाने में अमेरिका को कोई सफलता हाथ लगी नहीं है। पिछले साल अफगानिस्तान से अमेरिका ने अपना बोरिया-बिस्तर समेटने में ही बुद्धिमानी समझी थी। ऐसे में अगर अमेरिका अब ताइवान के लिए चीन से उलझता है तो वह खुद तो मुश्किलों में पड़ेगा ही, दुनिया को नए संकट में धकेल देगा।

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