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भय का राज

सुप्रीम कोर्ट ने पेशी के दौरान कन्हैया को और पत्रकारों को सुरक्षा मुहैया कराने के निर्देश दे रखे थे। पर इसका भी कोई असर नहीं दिखा।

Author नई दिल्ली | February 19, 2016 2:01 AM
पटियाला हाउस कोर्ट में पेशी के दौरान कन्हैया कुमार। (express photo by Prem nath Pandey 17 feb 2016)

दिल्ली की पटियाला हाउस अदालत में एक बार फिर वही हुआ जो जेएनयू छात्रसंघ अध्यक्ष कन्हैया कुमार की पिछली पेशी के दौरान हुआ था। यह हमारे लोकतंत्र के लिए बहुत ही अशुभ संकेत है। कानून के सबसे ज्यादा जानकार वकील ही माने जाते हैं। पर वकीलों के एक झुंड ने कन्हैया को मारा-पीटा, साथ ही पत्रकारों से भी बदसलूकी की। वकीलों का एक दूसरा समूह बीच-बचाव में आगे आया, तो उन्हें भी धक्का-मुक्की झेलनी पड़ी और अपशब्द सुनने पड़े। दूसरी तरफ महज डेढ़ किलोमीटर की दूरी पर सर्वोच्च न्यायालय में इसी मामले में एक याचिका पर सुनवाई चल रही थी। जब सर्वोच्च अदालत को इस हिंसा का पता चला तो उसने कुछ वरिष्ठ वकीलों की एक टीम मौके पर भेजी। पर इस टीम को भी कड़वे अनुभव हुए, हमलावर झुंड ने उन्हें ‘पाकिस्तान के दलाल’ कहा। क्या यह कानून का शासन है? कुछ ही समय पहले हमने अपना गणतंत्र दिवस मनाया। पर अब यह सवाल पूछने का वक्त है कि हमारे लोकतंत्र का क्या हाल है? पिछली बार पुलिस की भरपूर मौजूदगी में अदालत परिसर में जो कुछ हुआ उसके लिए दिल्ली पुलिस की काफी आलोचना हुई थी। पर इससे उसने कोई सबक नहीं सीखा, इस बार भी वह तमाशबीन बनी रही। और भी दुखद यह है कि सुप्रीम कोर्ट के निर्देश को भी दिल्ली पुलिस ने ताक पर रख दिया। सुप्रीम कोर्ट ने पेशी के दौरान कन्हैया को और पत्रकारों को सुरक्षा मुहैया कराने के निर्देश दे रखे थे। पर इसका भी कोई असर नहीं दिखा। आखिर दिल्ली पुलिस किसे खुश करना चाहती थी? जब दिल्ली पुलिस आयुक्त बीएस बस्सी हमले को झड़प बता रहे थे तभी अंदाजा हो गया था कि हकीकत पर परदा डालने और लीपापोती करने की कोशिश की जा रही है। पर सर्वोच्च न्यायालय के निर्देश की भी अवहेलना हो, यह बहुत ही खतरनाक हालत है।

प्रधानमंत्री ने पदभार संभालने के बाद संसद के अपने पहले संबोधन में भरोसा दिलाया था कि उनकी सरकार संवैधानिक संस्थाओं की गरिमा सुनिश्चित करेगी। पर आज सबसे चुभता सवाल यही है कि तमाम संस्थाओं की गरिमा के साथ खिलवाड़ हो रहा है। दुखी होकर सर्वोच्च न्यायालय को दिल्ली पुलिस के वकील से कहना पड़ा कि आप सुरक्षा मुहैया कराएं या हमें इसके लिए आपको सीधे आदेश देना पड़ेगा। जब दिल्ली पुलिस को दिल्ली सरकार के अधीन देने की मांग उठती है, तो जवाब में केंद्र का एक तर्क यह भी होता है कि अगर दिल्ली पुलिस को दिल्ली सरकार के मातहत कर दिया जाएगा, तो उसका राजनीतिक इस्तेमाल होने का अंदेशा रहेगा। सवाल उठता है कि अभी दिल्ली पुलिस क्या निष्पक्ष ढंग से काम कर रही है? बार काउंसिल आॅफ इंडिया ने मीडिया से माफी मांगते हुए यह भी कहा है कि हमलावर वकीलों के खिलाफ जरूर कार्रवाई की जाएगी, जरूरत महसूस हुई तो उनके लाइसेंस भी रद््द किए जा सकते हैं। यह स्वागत-योग्य है। वरिष्ठ वकीलों की टीम पटियाला हाउस अदालत भेजने से पहले सर्वोच्च न्यायालय ने भी कहा कि अफसोस कि वकील ऐसा कर रहे हैं; लॉ डिग्रीधारी और काला कोट पहने हर किसी को इस पेशे में नहीं आने देना चाहिए। यह चिंता उन सबकी होनी चाहिए जो न्यायिक कार्य और कानून के पेशे से वास्ता रखते हैं। संभव है हमलावरों में कुछ बाहरी लोग भी रहे हों और अपनी पहचान छिपाने के लिए वकीलों का चोगा पहन लिया हो। पर तब तो सबसे ज्यादा जोर-शोर से खुद वकीलों की तरफ से कार्रवाई की मांग उठनी चाहिए, क्योंकि यह उनकी प्रतिष्ठा का मामला है।

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