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सख्ती और संवाद

पठानकोट में हुए आतंकी हमले के कारण भारत और पाकिस्तान के विदेश सचिवों की प्रस्तावित बैठक को लेकर जो आशंका जताई जा रही थी, वह सही साबित हुई।

Author नई दिल्ली | Published on: January 16, 2016 12:06 AM
पठानकोट में हुए आतंकी हमले के कारण भारत और पाकिस्तान के विदेश सचिवों की प्रस्तावित बैठक को लेकर जो आशंका जताई जा रही थी, वह सही साबित हुई। (फाइल फोटो)

पठानकोट में हुए आतंकी हमले के कारण भारत और पाकिस्तान के विदेश सचिवों की प्रस्तावित बैठक को लेकर जो आशंका जताई जा रही थी, वह सही साबित हुई। बैठक शुक्रवार को इस्लामाबाद में होनी थी, पर टाल दी गई। पर द्विपक्षीय वार्ता की संभावना कायम है। दोनों पक्षों ने आपसी सहमति से बैठक टाली है। वह भी अनिश्चित काल के लिए नहीं, थोड़े वक्त के लिए। दोनों तरफ के विदेशी मामलों के प्रवक्ताओं ने संकेत दिए हैं कि टाली गई बैठक निकट भविष्य में ही होगी। भले एलान आपसी सहमति से किया गया, पर दरअसल यह भारत के रुख की ओर इशारा करता है। भारत एक तरफ सख्ती और दूसरी तरफ वार्ता की पहल को पटरी से न उतरने देने का संदेश देने में सफल हुआ है। आखिरकार यह पाकिस्तान की इच्छा नहीं रही होगी कि बैठक मुल्तवी कर दी जाए।

समस्या तो भारत सरकार के सामने थी कि जिस वक्त पठानकोट हमले को लेकर पूरे देश में गम और नाराजगी का आलम हो, पाकिस्तान से वार्ता के नए दौर की शुरुआत करना सियासी तौर पर महंगा कदम साबित हो सकता है। इसलिए उसकी हिचकिचाहट साफ दिख रही थी। सवाल यह है कि जब पठानकोट हमले को अंजाम देने वाले जैश-ए-मोहम्मद के खिलाफ पाकिस्तान की कार्रवाई पर सरकार ने संतोष जताया, तो बैठक क्यों टाल दी गई? इसकी वजह यही हो सकती है कि पाकिस्तान सरकार की कार्रवाई अभी शुरुआती स्तर पर है। जैश-ए-मोहम्मद के ठिकानों पर पाकिस्तान में छापेमारी हुई, और उसके कुछ लोग पकड़े भी गए हैं। लेकिन जैश के सरगना मसूद अजहर को हिरासत में लिए जाने की खबरों की पुष्टि पाकिस्तान सरकार ने अभी तक नहीं की है। पठानकोट हमले की जांच के लिए पाकिस्तान ने जिस विशेष जांच दल का गठन किया है उसे यहां आने की इजाजत भारत ने दे दी है। सवाल है कि क्या पाकिस्तान की ओर से उठाए गए ये कदम तार्किक परिणति तक पहुंचेंगे?

पहले के अनुभव उम्मीद नहीं जगाते। पर गेंद पाकिस्तान के पाले में है, और नवाज शरीफ को यह मौका दिया जाना चाहिए कि आतंकवाद के खिलाफ वे अपनी गंभीरता साबित करें। उन पर अंतरराष्ट्रीय दबाव पड़ने के भी संकेत हैं। मसलन, पिछले दिनों अमेरिकी कांग्रेस ने पाकिस्तान को दी जाने वाली सैन्य सहायता पर रोक लगा दी। फिर, पाकिस्तान के खासकर शहरी मध्यवर्ग में यह भावना जोर पकड़ रही है कि लश्कर-ए-तैयबा, जैश-ए-मोहम्मद और तहरीक-ए-तालिबान जैसे संगठनों के प्रति बरती गई ढिलाई खुद पाकिस्तान की एकता, स्थायित्व और शांति के लिए खतरा पैदा कर रही है। लिहाजा, इनसे कड़ाई से निपटने का वक्त आ गया है।

समस्या यह है कि विदेश नीति और सुरक्षा संबंधी मामलों को लेकर पाकिस्तान में फौज का दखल बहुत रहता है, कई बार निर्णायक भी। पर पठानकोट हमले के बाद अगर भारत बातचीत को रद्द कर देता तो इससे आतंकियों का ही हौसला बढ़ता; उन्हें लगता कि वे कोई कांड कर दोनों देशों के बीच संबंध सुधार की प्रक्रिया को जब चाहे तब पलीता लगा सकते हैं। इसके बजाय भारत ने एक संतुलित रणनीति अपनाई है, जिसमें सख्ती और संवाद, दोनों शामिल हैं। दोनों तरफ के विदेश सचिवों की स्थगित हुई बैठक अब जब भी हो, यह जाहिर है कि आतंकवाद के खिलाफ कार्रवाई का मुद््दा सबसे अहम होगा। अगर पाकिस्तान छिटपुट कार्रवाई तक सीमित न रहे, बल्कि पूरे आतंकी ढांचे के खात्मे का संकल्प ले, तो यह भारत से आपसी संबंधों की मजबूती के हक में ही नहीं, खुद उसके भी हित में होगा।

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