जीवन के अंग

यह अपने आप में विचित्र विचार है कि किसी व्यक्ति को अंगदान करने से इसलिए वंचित कर दिया जाए कि उसने अतीत में कोई अपराध किया था।

सांकेतिक फोटो।

यह अपने आप में विचित्र विचार है कि किसी व्यक्ति को अंगदान करने से इसलिए वंचित कर दिया जाए कि उसने अतीत में कोई अपराध किया था। न इसे कानूनी कसौटियों के मूल्यांकन के आधार पर उचित माना जा सकता है, न मानवीय दृष्टिकोण से। लेकिन केरल में यह मामला एक विडंबना के तौर पर सामने आया था कि वहां अंग प्रत्यारोपण प्राधिकरण समिति ने एक व्यक्ति की आपराधिक पृष्ठभूमि के आधार पर उसके अंगदान के आवेदन को खारिज कर दिया था। निश्चित तौर पर यह फैसला विरोधाभासी विचारों और पूर्वाग्रहों से संचालित था, जिसमें किसी व्यक्ति के बारे में प्रचलित धारणा के मुताबिक मान लिया जाता है कि उसका सभ्य और मानवीय दुनिया में कोई उपयोग नहीं रहा। जबकि अपराध और दंड की समूची व्यवस्था का मूल सुधार की बुनियाद पर टिका होता है, जिसमें बड़े अपराधियों को भी खुद में बदलाव लाने का मौका मिलने का विचार निहित है। ऐसे में अतीत में अपराध करने वाला कोई व्यक्ति अगर अपने जीवन की यह उपयोगिता समझने के पायदान पर आ गया है कि उसके शरीर के अंग से किसी की जान बच सकती है तो इससे बेहतर सुधार और क्या होगा!

अब इस मामले पर केरल उच्च न्यायालय ने जो फैसला दिया है, उसे मानवीय कसौटी पर एक महत्त्वपूर्ण पड़ाव के तौर पर देखा जाना चाहिए। अदालत ने साफ लहजे में कहा कि मानव शरीर में अपराधी गुर्दा, अपराधी यकृत या अपराधी हृदय जैसा कोई अंग नहीं होता। किसी गैर-आपराधिक पृष्ठभूमि वाले व्यक्ति और आपराधिक इतिहास वाले व्यक्ति के अंगों में कोई अंतर नहीं होता है। हम सभी की रगों में इंसानी खून ही दौड़ रहा है। जाहिर है, अदालत की यह टिप्पणी व्यक्ति के सार्वजनिक व्यवहार और उसके शरीर की प्राकृतिक बनावट को उसके वास्तविक संदर्भों में समझने की कोशिश है। यह ध्यान रखने की जरूरत है कि अगर कोई व्यक्ति आपराधिक वृत्तियों में लिप्त रहता है तो यह उसकी संगति, मानसिकता और विचार के कारण होता है। इसमें उसका शरीर या उसके अंग केवल संचालित पुर्जे की भूमिका में होते हैं। जीवित शरीर में अंगों का काम विचार को संचालित करना नहीं होता। वे प्राकृतिक रूप में सिर्फ जीवन को सक्रिय रखने की भूमिका में होते हैं। इसलिए अगर किसी आपराधिक पृष्ठभूमि के व्यक्ति का कोई अंग किसी अन्य जरूरतमंद में प्रत्यारोपित कर दिया जाता है तो वह जीवन का वाहक बनेगा, न कि अपने पूर्व शरीर के विचार का।

यों भी अंग प्रत्यारोपण से संबंधित 1994 के अधिनियम या इसके तहत बनाए गए मानव अंगों और ऊतकों के प्रतिरोपण नियम, 2014 के प्रावधानों के मुताबिक किसी दाता का पूर्व में आपराधिक पृष्ठभूमि का होना अंगदान से वंचित किए जाने का मानदंड नहीं हो सकता। इस संबंध में अदालत की यह आशंका गौरतलब है कि अगर समिति अपने पैमाने पर आगे बढ़ी तो भविष्य में अंगदान के वैसे आवेदनों को इस आधार पर खारिज कर दिया जा सकता है कि संबंधित व्यक्ति अतीत में कभी किसी अपराध में शामिल रहा है। अगर यह प्रवृत्ति बनी तो क्या यह रवैया धर्म और जाति के आधार पर भी अपनाया जाएगा? इसलिए अदालत के इस विचार को मानवीय पहलुओं को मजबूत करने वाला माना जाना चाहिए कि मानव अंग एवं ऊतक प्रतिरोपण अधिनियम को धर्मनिरपेक्षता का पथ प्रदर्शक बनने दें, ताकि विभिन्न धर्मों और आपराधिक पृष्ठभूमि के लोग भी अलग जातियों, नस्ल, धर्म या पूर्व में अपराधी रहे जरूरतमंद लोगों को अंगदान कर सकें। दुनिया भर में वैसे बहुत सारे लोगों की जान बचाई जा सकती है, जिन्हें हादसे या अन्य स्थितियों में जरूरत के वक्त अंग नहीं मिल पाता।

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