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सदन का समय

गुरुवार से संसद का शीतकालीन सत्र शुरू हो गया। हालांकि पहले दिन कोई व्यवधान नहीं हुआ, पर सत्र के भविष्य को लेकर अंदेशे कायम हैं।

गुरुवार से संसद का शीतकालीन सत्र शुरू हो गया। हालांकि पहले दिन कोई व्यवधान नहीं हुआ, पर सत्र के भविष्य को लेकर अंदेशे कायम हैं। दरअसल, छब्बीस नवंबर को संविधान दिवस था और यह पहले से तय था कि सत्र के शुरू के दो दिन संविधान और इसके निर्माण में बाबासाहब भीमराव आंबेडकर के योगदान पर चर्चा के लिए होंगे। क्या दो दिन के बाद जब संसद अपने विधायी एजेंडे पर लौटेगी, तब उसका कामकाज पटरी पर चलेगा? यह सवाल इसलिए उठता है क्योंकि मानसून सत्र का काफी वक्त जाया चला गया था।

ललित मोदी प्रकरण और व्यापमं घोटाले पर सरकार को घेरने के लिए विपक्ष ने संसद की कार्यवाही बाधित करने का तरीका आजमाने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी। यों विपक्ष में रहते हुए भाजपा का व्यवहार भी ऐसा ही रहा था। पर यह हंगामे के पक्ष में बचाव का तर्क नहीं हो सकता। सरकार को घेरने के लिए इस बार विपक्ष के पास असहिष्णुता और महंगाई जैसे मुद््दे हैं, इन पर बहस के लिए कुछ सदस्यों ने बाकायदा नोटिस भी दे रखे हैं। असहिष्णुता का मसला हमारे आधारभूत संवैधानिक मूल्यों से ताल्लुक रखता है, जिस पर हाल में राष्ट्रपति भी कई बार चिंता जता चुके हैं, वहीं महंगाई का मसला आम लोगों के रोजमर्रा के जीवन से जुड़ा हुआ है।

इन पर संसद में चर्चा जरूर होनी चाहिए, पर इस तरह नहीं कि कोई तकनीकी पेच अहं या प्रतिष्ठा का विषय बन जाए या बना लिया जाए। शीतकालीन सत्र के लिए सरकार के पास लंबी कार्यसूची है। जब पिछले सत्र का काफी समय बर्बाद गया हो, तो लंबित विधेयकों का भी भार अगले सत्र पर आ जाता है। सरकार की प्राथमिकता में सबसे ऊपर जीएसटी यानी वस्तु एवं सेवा कर (संविधान) संशोधन विधेयक है। अप्रत्यक्ष करों की संरचना को एकीकृत करने के मकसद से लाए गए इस विधेयक को आर्थिक सुधार के एक बड़े कदम के तौर पर देखा जा रहा है।

यह विधेयक लोकसभा में पारित हो चुका है, पर राज्यसभा में अटका हुआ है, जहां सत्तापक्ष का बहुमत नहीं है। इसके अधर में रहने का दोष सरकार ने विपक्ष पर मढ़ा है। पर वास्तव में यह मामला राज्यों की आशंकाओं से जुड़ा हुआ है। बहुत-से राज्य आशंकित हैं कि जीएसटी लागू होने से करों के मामले में वे अपनी स्वायत्तता खो देंगे। गुजरात जैसा भाजपा-शासित राज्य भी इस तरह का अंदेशा जता चुका है। जीएसटी चूंकि अंतिम चरण पर लागू होगा, इसलिए ऐसे राज्यों को राजस्व के नुकसान का अंदेशा ज्यादा सता रहा है जो मैन्युफैक्चरिंग में अग्रणी हैं।

इसलिए सरकार को सुझाए गए संशोधनों पर गंभीरता से विचार करना चाहिए, ताकि जीएसटी को अधिक से अधिक स्वीकार्य बनाया जा सके। इस सत्र में कुछ वित्तीय विधेयकों समेत सैंतीस विधेयक संसद की मुहर लगने की बाट जोह रहे हैं। इनमें रीयल एस्टेट (विकास एवं नियमन), विसलब्लोअर्स सुरक्षा, बेनामी लेन-देन निषेध (संशोधन), उपभोक्ता संरक्षण, लघु एवं मध्यम उद्यम विकास (संशोधन) जैसे अहम विधेयक शामिल हैं। इसलिए यह जरूरी है कि शीतकालीन सत्र का कामकाज सुचारु रूप से चले। सूखे पर भी चर्चा हो, क्योंकि इस वक्त देश के अनेक हिस्सों में किसान परिवार बड़ी मुसीबत में हैं। न उन्हें हुए नुकसान का ठीक आकलन हो पाया है न राहत दिलाने का कोई इंतजाम हुआ है। संसद की दिलचस्पी केवल सुर्खी वाले मुद््दों में नहीं, देश की सभी गंभीर समस्याओं में होनी चाहिए।

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