पिछले कई दिनों से संसद में जिस तरह का गतिरोध कायम है, दोनों सदनों को बार-बार स्थगित करने की नौबत सामने आ रही है, उसका हल निकालने को लेकर औपचारिक बयानों के अलावा सरकार की ओर से कोई गंभीर कोशिश होती नहीं दिख रही है। सवाल यह है कि अगर एक ही मुद्दे, यानी नीट प्रश्नपत्र लीक पर विरोध जताने वाले प्रदर्शनकारियों के प्रति पुलिस के बेलगाम रवैये पर विपक्षी दल जवाबदेही स्पष्ट करने की मांग कर रहे हैं, तो इससे किस तरह की आपत्ति हो सकती है।

यह सही है कि प्रश्नपत्र लीक के मुद्दे पर विरोध का दायरा व्यापक होते जाने के बाद तत्कालीन केंद्रीय शिक्षा मंत्री ने आखिर इस्तीफा दिया। मगर इस मसले पर विरोध प्रदर्शन में हिस्सा लेने वाले विद्यार्थियों पर दिल्ली पुलिस ने जिस तरह बेरहमी से लाठीचार्ज किया, बड़ी संख्या में छात्र-छात्राओं को चोट पहुंची, उसके लिए विपक्षी दल संसद में गृहमंत्री से जवाब की मांग कर रहे हैं। हैरानी की बात यह है कि इस संदर्भ में सरकार की ओर से जिस तरह विपक्ष की इस मांग को प्रकारांतर से खारिज किया जा रहा है, वह साफ तौर पर जवाबदेही से बचने की ही कोशिश है!

यह स्थिति तब है, जब राज्यसभा के सभापति के रूप में उपराष्ट्रपति सीपी राधाकृष्णन ने भी गुरुवार को संसदीय कार्यमंत्री किरेन रिजीजू से कहा कि वे गृहमंत्री को सदन में बुलाने के अनुरोध पर विचार करें। मगर इस संदर्भ में कोई सकारात्मक प्रतिक्रिया देने के बजाय विपक्षी सांसदों के प्रदर्शन को सरकार की ओर से ‘ड्रामा’ बताया गया। सवाल है कि इस तरह का रुख रखते हुए सरकार क्या यह दावा करने की स्थिति में है कि वह किसी भी मुद्दे पर उठे विवाद का हल संवाद या बातचीत के जरिए निकालने को तैयार है!

कहने को किरेन रिजीजू ने परिसीमन के मुद्दे पर विपक्ष के नेता राहुल गांधी से बातचीत करके समर्थन मांगा, लेकिन वहां भी प्रस्तावित विधेयकों पर सर्वदलीय बैठक बुलाने की मांग पर सहमति नहीं बन पा रही है। सरकार अगर किसी भी मुद्दे पर विपक्षी दलों की उपेक्षा कर या उनकी राय को दरकिनार कर एकतरफा तौर पर अपनी मर्जी के मुताबिक कोई हल निकालने के बारे में सोच रही है, तो इसे कैसे देखा जाएगा?

एक तरफ सरकार अपनी सुविधा से संवाद का स्वरूप तय करना चाहती है या फिर इसकी जरूरत को गैर-महत्त्वपूर्ण मानती है, दूसरी ओर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख मोहन भागवत स्पष्ट तौर पर बातचीत करने को ही प्राथमिक और लोकतंत्र का तकाजा मानते हैं। गौरतलब है कि मुंबई में नई पीढ़ी के बच्चों के साथ बातचीत के दौरान भागवत ने यह अहम टिप्पणी की कि ‘जेन-जी’ देश-विरोधी नहीं हैं और विरोध प्रदर्शन भी संवाद का वैध तरीका तथा लोकतंत्र में सहमति बनाने का एक जरिया है।

इस क्रम में अलग-अलग विचार एक साथ आते हैं और चर्चा के बाद आम सहमति बनती है। इस समूचे मसले को इतनी स्पष्टता के साथ भागवत ने जिस तरह देखा है, उसे लोकतंत्र का जीवन-तत्त्व माना जाना चाहिए। इसके बावजूद यह समझना मुश्किल है कि सरकार के भीतर इस मामले में एक विचित्र आग्रह क्यों दिखता है।

यह ध्यान रखने की जरूरत है कि नीट प्रश्नपत्र लीक होने के मुद्दे पर विद्यार्थियों के विरोध प्रदर्शन के साथ एक अहम बिंदु यह उभरा है कि सरकार की किसी नीति पर सवाल उठाने पर आम जनता के खिलाफ सख्ती बरतने के बजाय जवाबदेही लेने, जवाब देने और संवाद करने से ही लोकतंत्र बचेगा।