यह एक आदर्श स्थिति है कि देश की संसद में विधायी कामकाज सामान्य तरीके से पूरा हो। इसे सुनिश्चित करने की जितनी जिम्मेदारी विपक्षी दलों की है, उससे ज्यादा बड़ा दायित्व खुद सरकार का है कि वह विवादित मुद्दों पर संवाद के जरिए आमराय बनाकर सदन का काम सुचारु रूप से पूरा होने की स्थितियां निर्मित करे।

इसमें वैसे मुद्दे भी शामिल हैं, जो देश में किन्हीं वजहों से अचानक खड़े हो जाते हैं और जनता की ओर से उन पर सरकार से जवाब की उम्मीद या मांग की जाती है। विपक्षी दलों का कर्तव्य है कि वे जनता की नुमाइंदगी करते हुए उनकी आवाज, उनके मुद्दों को संसद में उठाएं और सरकार से जवाब मांगें।

मगर इससे बड़ी विडंबना और क्या होगी कि सरकार को इस तरह की स्थितियों में सकारात्मक माहौल बनाने के लिए अपनी ओर से पहल करना कोई गैर-महत्त्व की बात लगती है। इसका असर संसद की कार्यवाही पर भी पड़ता है। सवाल है कि देश की संसद अगर जनता के मुद्दों पर विचार और बहस के जरिए किसी निष्कर्ष तक पहुंचने के लिए नहीं, तो आखिर किसलिए है!

गौरतलब है कि मंगलवार को संसद के दोनों सदनों की कार्यवाही इसलिए स्थगित कर दी गई कि विपक्षी दल सरकार से इस पर जवाब चाहते थे कि एक दिन पहले दिल्ली में संसद मार्च के आह्वान के तहत जुटे युवाओं पर जिस तरह की पुलिस कार्रवाई देखी गई, उसकी जिम्मेदारी तय हो।

मगर इसके बजाय दोनों सदनों में सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच हुए हंगामे की वजह से कार्यवाही स्थगित कर दी गई। स्वाभाविक ही विपक्षी दलों को यह आरोप लगाने का मौका मिला कि हम पुलिस के अत्याचार, प्रदर्शन कर रहे विद्यार्थियों पर लाठी चलाने और उनके घायल होने के मुद्दे पर सदन में चर्चा कराने तथा गृह मंत्री के बयान की मांग कर रहे थे, लेकिन सरकार ने चर्चा का अवसर नहीं दिया, हमारा मुंह बंद करा दिया।

एक लोकतांत्रिक व्यवस्था में विपक्ष की ओर से अगर ऐसे सवाल उठाए जाते हैं, तो सरकार को इसे गंभीरता से लेना चाहिए। विडंबना यह है कि न तो केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा मांग रहे आंदोलनकारियों से संवाद स्थापित करके कोई हल निकालने की कोशिश की गई और न ही संसद में इस मसले पर बहस के लिए सकारात्मक माहौल निर्मित किया जा रहा है।

सवाल है कि अगर सरकार को बातचीत के जरिए कोई रास्ता निकालना प्राथमिक और जरूरी नहीं लग रहा है, तो उसकी नजर में इसका क्या समाधान है। विपक्षी दल भी आम नागरिकों का ही प्रतिनिधित्व करते हैं। अगर वे एक ज्वलंत मुद्दे पर बहस चाहते हैं और सरकार से जवाब मांग रहे हैं, तो इसे संवाद के रास्ते ही एक निष्कर्ष तक पहुंचाया जा सकता है।

इसके बाद संसद में बाकी विधायी कामकाज भी सहजता के साथ निपटाए जा सकते हैं। मगर पिछले कुछ समय से सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच ज्यादातर मुद्दों पर मतभिन्नता सीधे टकराव का रूप लेने लगी है और सबसे आसान उपाय सदन को स्थगित करना मान लिया जाता है।

क्या यह समस्याओं का हल तलाशने और जनभावनाओं को तुष्ट करने का कोई आदर्श उपाय हो सकता है? दोनों सदनों की कार्यवाही पर हर रोज करोड़ों रुपये का खर्च आता है। संसद की उपयोगिता का आधार लोकतांत्रिक संवाद ही है। अगर संवाद की जगह सिकुड़ेगी, तो लोकतंत्र कमजोर होगा और यह ध्यान रखने की जरूरत है कि देश की वास्तविक शक्ति लोकतंत्र में ही निहित है।