पंजशीर का संकट

तालिबान ने अब पंजशीर पर भी कब्जा कर लेने का दावा कर दिया है।

सांकेतिक फोटो।

तालिबान ने अब पंजशीर पर भी कब्जा कर लेने का दावा कर दिया है। सिर्फ यही प्रांत रह गया था जिस पर नियंत्रण के लिए पिछले कई दिनों से तालिबान और नेशनल रेजिस्टेंट फ्रंट आॅफ अफगानिस्तान (एनआरएफए) के लड़ाकों में भीषण जंग चल रही थी। एनआरएफए की अगुआई अहमद मसूद के हाथ में हैं। हालांकि मसूद ने पंजशीर पर तालिबान के नियंत्रण के दावे को खारिज कर दिया है और अंतिम सांस तक लड़ने की बात कही है। पंजशीर के हालात को लेकर जो खबरें आ रही हैं, वे गंभीर संकट का संकेत दे रही हैं। कहा तो यह भी जा रहा है कि पंजशीर पर कब्जे के लिए तालिबान की मदद के लिए पाकिस्तान ने लड़ाके भेजे हैं। इसमें कोई संदेह नहीं कि इस वक्त एनआरएफए ही तालिबान के लिए सबसे बड़ा कांटा साबित हो रहा है। इसलिए तालिबान इसे निकाल फेंकना चाहता है। पर यह इतना आसान भी नहीं है। पंजशीर पर कब्जे की जंग देश को गृहयुद्ध की ओर धकेलने की शुरूआत है।

हालांकि अफगानिस्तान में अब अंतरिम सरकार बन चुकी है। लेकिन सरकार बनाने की कवायद जिस तरह से चली, वह इस बात का स्पष्ट संकेत है कि सत्ता में भागीदारी को लेकर तालिबान के भीतर गहरे मतभेद रहे हैं। चार दिन पहले तालिबान ने हिबातुल्ला अखुंदजादा को देश का सर्वोच्च नेता घोषित किया था। लेकिन उसके दूसरे धड़ों ने ही इसका विरोध कर दिया। इसलिए अब अंतरिम सरकार की कमान मुल्ला हसन अखुंद को सौंपी गई है। वे प्रधानमंत्री बनाए गए हैं। इसी तरह तालिबान ने पहले मुल्ला बरादर को देश का राष्ट्रपति घोषित कर दिया था। पर अब बरादर उपप्रधानमंत्री होंगे। जाहिर है, यह ऐसा संकट है कि जो अफगानिस्तान में तालिबान सरकार को आसानी से नहीं चलने देगा। फिर, पाकिस्तान भी तालिबान सत्ता में हक्कानी नेटवर्क की जोरदार मौजूदगी बनाए रखना चाहता है। उसके दबाव में तालिबान ने हक्कानी नेटवर्क के मुखिया सिराजुद्दीन हक्कानी को देश का गृह मंत्री बनाया है। हैरानी की बात यह है कि एक ओर तो तालिबान कहता रहा है कि वह अपने अंदरूनी मामलों में किसी भी देश का दखल बर्दाश्त नहीं करेगा, और दूसरी ओर बिना पाकिस्तान के दखल के एक कदम भी बढ़ नहीं पा रहा। ऐसे में पंजशीर के मामले में तालिबान की अंतरिम सरकार अब किस तरह से बढ़ती है, यह देखने की बात है।

तालिबान पंजशीर पर कब्जे का दावा भले करता रहे, पर हालात बता रहे हैं कि पंजशीर की लड़ाई थमने वाली नहीं है। पंजशीर का इतिहास भी इस बात का गवाह रहा है। रूस जैसा देश एक दशक की लड़ाई के बाद भी पंजशीर पर कब्जा नहीं कर सका था। अहमद शाह मसूद की फौज ने रूसी सैनिकों को खदेड़ दिया था। फिर तालिबान भी दो दशक पहले पंजशीर को अपने कब्जे में नहीं ले पाया था। अहमद मसूद अब अमेरिका सहित दूसरे देशों से तालिबान के खिलाफ लड़ाई में मदद मांग रहा है। जाहिर है, तालिबान के खिलाफ पश्चिमी ताकतें एकजुट होकर मसूद के साथ परोक्ष रूप से खड़ी रहेंगी और पंजशीर युद्ध का मैदान बना रहेगा। पंजशीर पर तालिबान के कब्जे को लेकर ईरान ने आंखें दिखाई हैं। ईरान के सुर बता रहे हैं कि एक सीमा के बाद वह चुप नहीं बैठेगा। ऐसे में बेहतर यही होगा कि तालिबान उदार रुख दिखाते हुए पंजशीर नेता मसूद से वार्ता और समझौते का हाथ बढ़ाए। अफगानिस्तान में इस वक्त सबसे बड़ी जरूरत देश को खूनखराबे और अराजकता से बचाने की है। यह अंतरिम सरकार की प्राथमिकता होनी चाहिए।

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