दहशत का दायरा

कश्मीर घाटी में अब आतंकी संगठनों की हताशा स्पष्ट नजर आने लगी है।

सांकेतिक फोटो।

कश्मीर घाटी में अब आतंकी संगठनों की हताशा स्पष्ट नजर आने लगी है। सेना और सुरक्षाबलों की चौकसी के चलते सीमा पार से घुसपैठ पर लगाम लगी है, सतत तलाशी और निगरानी अभियान की वजह से छिपे आतंकवादियों की पहचान और धर-पकड़ बढ़ी है। ऐसे में जिस तरह पहले वे आम नागरिकों और खासकर युवाओं को बरगला कर हिंसा के लिए उकसाने और पत्थरबाजी आदि करवाने में सफल हो जाया करते थे, वह अब नहीं कर पा रहे। पिछले दिनों बड़े पैमाने पर छापे पड़े, जिनमें दहशतगर्दों को वित्तीय मदद पहुंचाने वालों पर लगाम कस दी गई।

इस तरह उनके पास संसाधनों का अभाव लगातार बढ़ता जा रहा है। इसी का नतीजा है कि अब वे प्रशासन और सरकार को चुनौती देने के बजाय स्थानीय लोगों पर ही अपनी खीज निकालते देखे जा रहे हैं। मंगलवार को घाटी के तीन इलाकों में तीन लोगों की हत्या कर दी गई। वे तीनों स्थानीय कारोबारी थे। उनमें एक कश्मीरी पंडित कारोबारी भी था, जिसने दहशतगर्दी के दौर में भी घाटी छोड़ कर जाने के बजाय वहीं रहने वहीं रहने का फैसला किया था। बाकी दो सामान्य कारोबारी थे, जिनमें से एक खोमचे पर भेलपुरी बेच कर अपने परिवार का पेट पालता था। दूसरा टैक्सी चालकों का संगठन चलाता था और बताया जाता है कि स्थानीय लोगों की हर तरह से मदद किया करता था।

ऐसी छिछली किस्म की हरकतें किसी बड़े मकसद वाले संगठन की नहीं हो सकतीं। इस तरह वे क्या संदेश देना चाहते हैं, समझ से परे है। ऐसे काम वहशी किस्म के लोग करते हैं, जिनका मकसद सिर्फ स्थानीय लोगों में भय पैदा करना होता है। जिन्हें मारा गया, वे कोई बड़े व्यापारी भी नहीं थे, जिनसे उन्हें किसी प्रकार की रंजिश या खुंदक हो सकती है। कुछ देर को अगर मान भी लें कि एक कश्मीरी पंडित को मार कर वे संदेश देना चाहते रहे होंगे कि वे फिर से पंडितों को वहां से खदेड़ना चाहते हैं, तो इस बात में भी कोई दम नजर नहीं आता। यह ठीक है कि केंद्र की सरकारें कश्मीरी पंडितों को फिर से घाटी में लौट आने के लिए मनाने का प्रयास करती रही हैं। उन्हें वहां बसाने के लिए योजनाएं भी बनाती रही हैं। जो लोग अपना घर-बार, खेत-खलिहान वहां छोड़ आए थे, उसे दिलाने का आश्वासन देती रही हैं। मगर ताजा घटना में जिस कश्मीरी पंडित की हत्या की गई, वह न तो वहां की व्यवस्था में किसी महत्त्वपूर्ण जिम्मेदारी का निर्वाह कर रहा था, न उसे मारने से व्यापक कश्मीरी पंडित समुदाय को कोई गंभीर संदेश जाता है।

दरअसल, घाटी में सक्रिय आतंकी संगठनों पर चौतरफा शिकंजा कस चुका है। सबसे बड़ी मुश्किल उन्हें स्थानीय लोगों से पहले जैसा समर्थन न मिल पाने की वजह से पैदा हो रही है। पहले उन्हें स्थानीय लोग संरक्षण दे दिया करते थे, अगर कभी सुरक्षाबल उन्हें पकड़ने के लिए घेराबंदी करते थे, लोग उन्हें रोकने के लिए कवच की तरह खड़े हो जाते थे। अब वैसा नहीं होता। स्थानीय लोग भी समझ चुके हैं कि उनका मुस्तकबिल आतंक में नहीं, मुख्यधारा में शामिल होकर ही है। उधर सीमा पार से भी वैसी मदद नहीं मिल पा रही। हुर्रियत के नेता और कट्टरपंथी ताकतें सलाखों के पीछे हैं या फिर निष्क्रिय कर दी गई हैं। ऐसे में वे किस सहारे अपने पांव पसार पाएंगे। इसकी हताशा और खीज वे लुक-छिप कर निरीह स्थानीय निवासियों पर निकाल रहे हैं। मगर इससे उनका कोई मकसद नहीं सधने वाला।

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