अक्सर ऐसा देखा जाता है कि कुछ सरकारी कल्याण कार्यक्रम आम लोगों के लिए बेहद उपयोगी होते हैं, मुश्किल और विपरीत स्थितियों में उनसे काफी राहत मिल सकती है, लेकिन जानकारी या जागरूकता के अभाव में लोग उसका लाभ नहीं उठा पाते। हरियाणा के पंचकूला में पिछले वर्ष आवारा कुत्तों के काटने के 14,230 मामले दर्ज किए गए। जाहिर है, इसके बाद पीड़ितों ने अपना इलाज कराया होगा और उससे जुड़ी मुश्किलों का सामना किया होगा।
विडंबना यह है कि इस संबंध में सरकार की ओर से मुआवजा देने का जो प्रावधान किया गया है, उसकी जानकारी बहुत कम लोगों के पास है। इसके मुताबिक कुत्ते के एक दांत के निशान पर दस हजार रुपए और 0.2 सेमी से अधिक गहरे घाव पर बीस हजार रुपए मुआवजा देने की व्यवस्था है। मगर इस नीति के तहत पंचकूला में जिला स्तरीय समिति की पहली बैठक में सिर्फ नौ आवेदक पहुंचे। यह जनता के हित में लागू सरकारी कल्याण कार्यक्रमों या योजनाओं की लोगों तक पहुंच की हकीकत है, जिसमें जागरूकता के अभाव में पीड़ित अपने हक से भी वंचित रह जाते हैं।
विडंबना यह है कि सरकारी कल्याण योजनाओं के बारे में कई बार लोगों के भीतर जानकारी की कमी पाई जाती है और क्षति की स्थिति में नियमों के मुताबिक सही पात्र होने के बावजूद ज्यादातर लोग राहत या मुआवजा हासिल करने के लिए दावा नहीं करते। नतीजतन, एक ओर पीड़ित व्यक्ति अपने नुकसान की भरपाई कई स्तर पर खुद ही करता है, तो दूसरी ओर इस मद में सरकार के कोष में जो राशि होती है, वह बिना उपयोग के पड़ी रहती है या उसका किसी अन्य काम में उपयोग हो जाता है।
सरकार जनता के कल्याण के लिए समय-समय पर योजनाएं या कल्याण कार्यक्रम बनाती या उन्हें अद्यतन करती रहती है। मगर क्या उन योजनाओं के बारे में जनता के बीच उचित स्तर पर जागरूकता अभियान चलाया जाता है, ताकि आम लोगों को अपने हक के बारे में जानकारी मिले और वे जरूरत या समय पड़ने पर उसका लाभ उठा सकें? अगर जनहित के उद्देश्य से कोई योजना लागू की जाती है, जिसके बारे में जागरूकता की कमी की वजह से सही पात्र लोगों के पास जानकारी ही नहीं पहुंच सके, तो उसका क्या लाभ?
