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संपादकीय: जासूसी का जाल

आंतरिक मामलों में बेजा दखल से लेकर नाहक घुसपैठ आदि के मामलों को लेकर भारत जब भी पाकिस्तान को सबूतों के साथ कठघरे में खड़ा करता है तब पाकिस्तान खुद को पीड़ित बता कर दुनिया के सामने पेश करने लगता है। यह एक तरह से पाकिस्तान की फितरत में शामिल हो चुका है और यही वजह है कि अब विश्व समुदाय के सामने पाकिस्तान अपनी कोई बात कहता है तब उस पर किसी देश को सहज विश्वास नहीं होता।

भारत में जासूसी कर रहे दो पाकिस्तानी अफसरों के देश से निकाले जाने पर पड़ोसी देश जवाबी कार्रवाई कर सकता है।

भारत में जासूसी का जाल बिछाने और यहां के कुछ सरकारी या फिर सैन्य प्रतिष्ठानों के अधिकारियों या कर्मचारियों को प्रलोभन देकर सुरक्षा संबंधी संवेदनशील सूचनाएं हासिल करने की पाकिस्तानी हरकतें कोई नई नहीं हैं। अमूमन हर बार ऐसी गतिविधियों का खुलासा होने के बाद भारत उसे चेतावनी देता है, मगर उसकी ओर से ऐसी हरकतें जारी रहती हैं। अपनी इस आदत से लाचार होने के बावजूद पाकिस्तान को यह उम्मीद रहती है कि भारत उसके मामले में रियायत बरते।

सवाल है कि ऐसा कैसे और कितने दिनों तक संभव है कि कोई देश अपने पड़ोसी के घर की संवेदनशील सूचनाएं हासिल करने के लिए अवैध तौर-तरीके अख्तियार करता रहे और हर बार पकड़े जाने के बावजूद उसके साथ उदारता बरती जाए? गौरतलब है कि रविवार को दिल्ली के करोलबाग में दो संदिग्ध पाकिस्तानी अधिकारियों को पकड़ा गया, जो जासूसी का जाल बिछा कर किसी भारतीय से सेना और रेलवे की गतिविधियों के बारे में सूचनाएं हासिल करने की कोशिश कर रहे थे।

ये दोनों दिल्ली स्थित पाकिस्तान उच्चायोग के वीजा विभाग में काम करते थे। खबरों के मुताबिक ये पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आइएसआइ के निर्देश पर सूचनाएं निकालने के लिए भारतीय सेना के अफसरों को अपने जाल में फांसते थे।

सामान्य स्थितियों में जासूसी के जरिए संवेदनशील सैन्य दस्तावेज हासिल करने की कोशिश के लिए किसी व्यक्ति को किस तरह के मुकदमे और सजा का सामना करना पड़ सकता है, इसका अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं है। लेकिन अंतरराष्ट्रीय समझौतों और कायदों का खयाल रखते हुए भारत ने इन कर्मचारियों को चौबीस घंटे के अंदर देश छोड़ने का आदेश दिया और वे चले गए। अफसोस की बात यह है कि इस घटना पर शर्मिंदा होने के बजाय उल्टे पाकिस्तान ने इस्लामाबाद में भारतीय उच्चायोग के राजनयिक को तलब किया और आपत्ति जाहिर की।

अगर पाकिस्तान को इस बात की फिक्र है कि उसके उच्चायोग के अफसरों को जासूसी के आरोप में पकड़ने और वापस भेजने से वियना संधि का उल्लंघन हुआ है, तो उसे यह भी बताना चाहिए कि पड़ोसी या किसी भी देश में अवैध तरीके से जासूसी करके संवेदनशील दस्तावेजों तक घुसपैठ करने को कैसे देखा जाएगा! खुद पाकिस्तान अपनी सीमा के भीतर किसी बाहरी देश की ओर से ऐसी गतिविधि पर कैसी प्रतिक्रिया करता? लेकिन रंगे हाथों पकड़े जाने के बावजूद पाकिस्तान अपनी गलती स्वीकार करने और उस पर खेद जाहिर करने के बजाय उल्टे अपनी अकड़ क्यों दिखा रहा है!

चार साल पहले भी ठीक इसी तरह का मामला सामने आया था। हाल के वर्षों में भारतीय सेना के कुछ जवानों को ‘हनी ट्रैप’ में फंसाने और उनसे संवेदनशील सूचनाएं हासिल करने की कोशिशें भी की गई हैं। लेकिन भारत अपने सक्षम खुफिया तंत्र के बूते पाकिस्तान की हरकतों का पर्दाफाश करता रहा है।

अपने आंतरिक मामलों में बेजा दखल से लेकर नाहक घुसपैठ आदि के मामलों को लेकर भारत जब भी पाकिस्तान को सबूतों के साथ कठघरे में खड़ा करता है तब पाकिस्तान खुद को पीड़ित बता कर दुनिया के सामने पेश करने लगता है। यह एक तरह से पाकिस्तान की फितरत में शामिल हो चुका है और यही वजह है कि अब विश्व समुदाय के सामने पाकिस्तान अपनी कोई बात कहता है तब उस पर किसी देश को सहज विश्वास नहीं होता। सवाल है कि पाकिस्तान अपनी इन हरकतों से छुटकारा पाए बिना किसी अन्य देश से अच्छा दोस्त होने की उम्मीद कैसे कर सकता है!

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