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संपादकीय: उकसावे की हद

विडंबना यह है कि एक ओर अंतरराष्ट्रीय मंचों पर पाकिस्तान क्षेत्र में अपनी मदद के लिए गुहार लगाता है, दूसरी ओर बिना किसी वजह के अचानक ही संघर्ष-विराम का उल्लंघन करने में भी उसे कोई हिचक नहीं होती। उसे शायद इस बात का खयाल तक नहीं होता कि अगर भारत अपनी गरिमा के मुताबिक संयम और धीरज नहीं दिखाए तो उसकी ऐसी हरकतों की वजह से युद्ध की स्थिति पैदा हो सकती है और उसके बाद पाकिस्तान को बेहद बुरे हालात का सामना करना पड़ सकता है।

Author Updated: October 3, 2020 12:34 AM
pakistan ceasefireवास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) पर पाकिस्तान ने गुरुवार को एक बार फिर संघर्ष-विराम की स्थिति का उल्लंघन किया और नियंत्रण रेखा के पास गोलीबारी की। अंतरराष्ट्रीय सीमा से सटे सेना के पोस्ट पर अचानक ही मोर्टार दाग कर उन्हें निशाना बनाया गया। नतीजतन, सेना के एक लांसनायक सहित तीन जवान शहीद हो गए

पाकिस्तान की यह आम फितरत रही है कि जब वह आंतरिक मोर्चे पर किसी मुश्किल में घिरता है तो उसकी सबसे पहली हरकत भारतीय सीमा के पार कोई अवांछित कार्रवाई होती है, ताकि दुनिया का ध्यान भटकाया जा सके। गुरुवार को एक बार फिर पाकिस्तान की तरफ से संघर्ष-विराम की स्थिति का उल्लंघन किया गया और नियंत्रण रेखा के पास गोलीबारी की गई। अंतरराष्ट्रीय सीमा से सटे सेना के पोस्ट पर अचानक ही मोर्टार दाग कर उन्हें निशाना बनाया गया। नतीजतन, सेना के एक लांसनायक सहित तीन जवान शहीद हो गए, जबकि पांच जवान घायल हुए। हालांकि इसके बाद भारतीय सेना ने इसका मुंहतोड़ जवाब दिया।

विडंबना यह है कि एक ओर अंतरराष्ट्रीय मंचों पर पाकिस्तान क्षेत्र में अपनी मदद के लिए गुहार लगाता है, दूसरी ओर बिना किसी वजह के अचानक ही संघर्ष-विराम का उल्लंघन करने में भी उसे कोई हिचक नहीं होती। उसे शायद इस बात का खयाल तक नहीं होता कि अगर भारत अपनी गरिमा के मुताबिक संयम और धीरज नहीं दिखाए तो उसकी ऐसी हरकतों की वजह से युद्ध की स्थिति पैदा हो सकती है और उसके बाद पाकिस्तान को बेहद बुरे हालात का सामना करना पड़ सकता है। सवाल है कि आखिर वह किसे धोखा देने की कोशिश करता रहता है!

गौरतलब है कि सन 2003 में भारत और पाकिस्तान के बीच नियंत्रण रेखा पर युद्ध विराम का समझौता हुआ था। लेकिन इस मसले पर अब तक के इतिहास को देखते हुए ऐसा लगता है कि इस समझौते को बनाए रखने की जिम्मेदारी अकेले भारत ने उठा रखी है। यह किसी छिपा नहीं है कि बिना किसी संदर्भ के भी पाकिस्तान जम्मू-कश्मीर का सवाल उठा कर वैश्विक समुदाय के सामने घड़ियाली आंसू बहाना शुरू कर देता है। लेकिन इस पर्दे में वह सीमा क्षेत्र में क्या करता है, इस पर दुनिया की नजर नहीं जा पाती। एक खबर के मुताबिक सिर्फ पिछले आठ महीनों में पाकिस्तान की ओर से तीन हजार से अधिक बार युद्धविराम का उल्लंघन किया गया है, जो पिछले सत्रह सालों में सबसे ज्यादा है।

कल्पना की जा सकती है कि अगर भारत ने पाकिस्तान की ऐसी गैरजिम्मेदाराना हरकतों के बरक्स दुनिया में शांति की वकालत करने और उसे निबाहने वाले एक जिम्मेदार देश की अपनी भूमिका नहीं बनाए रखता तो कैसे हालात पैदा हो सकते थे। हालांकि अपनी सीमा की रक्षा करना और संप्रभुता की गरिमा बचाना एक अनिवार्य स्थिति है, इसलिए भारत ने हर मौके पर पाकिस्तान को करारा जवाब दिया और उसे उसकी हद बताई।

विडंबना है कि यह सब करते हुए पाकिस्तान को यह भी ध्यान रखने की जरूरत नहीं महसूस होती कि संघर्ष-विराम की सहमति की कुछ शर्तें होती हैं और उसकी कद्र करना दोनों पक्षों की जिम्मेदारी होती है। ऐसा लगता है कि पाकिस्तान जब भी किसी अंतरराष्ट्रीय दबाव से गुजरता है तब शांति और युद्ध-विराम की स्थिति बनाए रखने पर तो सहमत हो जाता है, लेकिन फिर जब अपनी सीमा या कब्जे वाले क्षेत्र के भीतर किसी उथल-पुथल या चुनौती का सामना करने लगता है, तब उसे किसी समझौते का खयाल रखना जरूरी नहीं लगता।

यह किसी से छिपा नहीं है कि फिलहाल पाकिस्तान अपने कब्जे वाले क्षेत्र में गिलगित-बाल्टिस्तान को पांचवें प्रांत का दर्जा देने से संबंधित किस गंभीर मुश्किल से गुजर रहा है। हालत यह है कि गिलगित-बाल्टिस्तान से भारत के पक्ष में उठती आवाजों को रोक पाना उसके लिए एक चुनौती बनती जा रही है। इसलिए पाकिस्तान अगर भारतीय क्षेत्र में संघर्ष-विराम का उल्लंघन करके लोगों का ध्यान बंटाने की कोशिश कर रहा है तो इसके निहितार्थ समझे जा सकते हैं। लेकिन उसे यह याद रखने की जरूरत है कि भारत एक सीमा के बाद चुप नहीं बैठ सकता।

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