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संपादकीयः नक्शेबाजी

कुछ समय पहले नेपाल ने भी इसी तरह अपना नया राजनीतिक नक्शा जारी कर भारत के हिस्से वाले कालापानी, लिपुलेख और लिंपियाधुरा इलाकों को अपना बताया था। पाकिस्तान भी उसी के नक्शे-कदम पर चल पड़ा है।

नक्शे में पाकिस्तान ने कश्मीर के सियाचिन से लेकर गुजरात के जूनागढ़ तक पर अपना दावा जता दिया है।

पाकिस्तान के लिए सरहद का मामला मानो बच्चों का खेल हो कि जहां चाहा बाहें फैला कर किसी भी इलाके पर अपना दावा ठोक दिया। अभी तक वह कश्मीर और लद्दाख को अपने देश का हिस्सा बताता रहा है। अब उसने कश्मीर के सियाचिन से लेकर गुजरात के जूनागढ़ तक पर अपना दावा जता दिया है। पाकिस्तानी मंत्रिमंडल ने मंगलवार को नया राजनीतिक नक्शा जारी किया, जिसमें भारत के उन सभी इलाकों को पाकिस्तान में दिखाया गया है, जिन्हें लेकर विवाद रहा है। अब इस नक्शे को वह संयुक्त राष्ट्र में पेश करना चाहता है। पाकिस्तान ने यह कदम कश्मीर मेें अनुच्छेद तीन सौ सत्तर खत्म होने की बरसी से एक दिन पहले उठाया। इस मौके पर पाकिस्तानी प्रधानमंत्री भारत के खिलाफ जम कर बरसे भी। अनुच्छेद तीन सौ सत्तर को हटाने का फैसला पाकिस्तान को फांस की तरह चुभता रहा है। इस मामले को उसने जहां मौका मिला अंतरराष्ट्रीय मंचों पर उठाया, मगर कोई कामयाबी नहीं मिली। अब उसने सीधे अपने नक्शे में बदलाव कर दिया है। संयुक्त राष्ट्र का ध्यान खींचने के लिए सीमा विवाद वाले देश इस तरह अपने नक्शों में बदलाव करते रहते हैं। पर इससे पाकिस्तान को सिर्फ अपनी खुन्नस मिटाने के अलावा हकीकत में हासिल क्या होगा, शायद उसे भी ठीक से नहीं पता।

कुछ समय पहले नेपाल ने भी इसी तरह अपना नया राजनीतिक नक्शा जारी कर भारत के हिस्से वाले कालापानी, लिपुलेख और लिंपियाधुरा इलाकों को अपना बताया था। पाकिस्तान भी उसी के नक्शे-कदम पर चल पड़ा है। चीन पहले ही वास्तविक नियंत्रण रेखा के पास वाले कई इलाकों पर अपना हक जताता रहा है। इसे लेकर दोनों देशों की सेनाएं आमने-सामने हैं, बातचीत का दौर चल रहा है, पर अभी किसी नतीजे पर नहीं पहुंचा जा सका है। इन स्थितियों को देखते हुए समझा जा सकता है कि पाकिस्तान और नेपाल केवल खुन्नस में या फिर वास्तव में अपने हक के लिए भारत से यह तनातनी मोल लेने को तत्पर नहीं हैं। चीन ने इन दोनों देशों में भारी निवेश किया है। पाकिस्तान पहले ही अमेरिकी सरपरस्ती छोड़ कर चीन के साथ जा लगा है। आतंकवाद के मसले पर पिछले चार-पांच सालों से उस पर अमेरिकी शिकंजा काफी कसा है, जबकि चीन लगातार अंतरराष्ट्रीय मंचों पर उसका बचाव करता रहा है। चीन का अपना स्वार्थ भी है कि पाकिस्तान में अपनी पैठ बना कर वह भारत पर दबाव बना सकता है। नेपाल में भी अपनी मौजूदगी बनाने के पीछे उसका यही मकसद है कि वहां से भारतीय सेना का गतिविधियों पर वह आसानी से नजर रख सकता है। इसलिए पाकिस्तान ने यह नई नक्शेबाजी चीन के और निकट आने के मकसद से ही की है।

मगर इस तरह पाकिस्तान कभी अमेरिका, तो कभी चीन के हाथों की कठपुतली बन कर कब तक भारत से दुश्मनी निभाता रह सकता है। इमरान खान ने सत्ता की बागडोर संभाली थी, तो उन्होंने सरहद के झगड़ों और दहशतगर्दी को तरजीह देने के बजाय देश की तरक्की को तवज्जो देने का मंसूबा जाहिर किया था। मगर वे भी फिर उसी रास्ते पर लौट आए, जिस पर वहां के पुराने हुक्मरान चलते आए थे। पाकिस्तान मुफलिसी में गर्क है और किसी न किसी ताकतवर देश का दामन पकड़ कर गुजारा चलाता रहा है, ऐसे में वह सरहद के झगड़ों में पड़ कर अपना और नुकसान करेगा। जहां तक संयुक्त राष्ट्र की बात है, वहां पहले ही उसकी असलियत उजागर है, सो उसके नए नक्शे पर शायद ही कोई गौर करे।

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