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संपादकीय: नया विवाद

पाकिस्तान ने करतारपुर साहिब की बाहरी जमीन का नियंत्रण अपने हाथ में ले लिया। इस जमीन की देखभाल का जिम्मा एक परियोजना प्रबंधन इकाई (पीएमयू) करेगी और यह इवैक्यू ट्रस्ट प्रॉपर्टी बोर्ड (ईटीपीबी) के अधीन काम करेगी। जाहिर है, इस सारी कवायद का मकसद बाहरी जमीन की देखभाल की आड़ में गुरुद्वारे के प्रबंधन में दखल देना और किसी बहाने उस पर नियंत्रण रखना है।

करतारपुर साहिब को लेकर पाकिस्तान सरकार का नया फरमान उसकी असहिष्णुता का एक और प्रमाण है।

करतारपुर गलियारा खुले अभी एक साल पूरा भी नहीं हुआ कि पाकिस्तान ने फिर ऐसा कदम उठाया जो सिख समुदाय की भावनाओं आहत करने और भारत को चिढ़ाने वाला है। इस बार पाकिस्तान ने करतारपुर साहिब की बाहरी जमीन का नियंत्रण अपने हाथ में ले लिया। इस जमीन की देखभाल का जिम्मा एक परियोजना प्रबंधन इकाई (पीएमयू) करेगी और यह इवैक्यू ट्रस्ट प्रॉपर्टी बोर्ड (ईटीपीबी) के अधीन काम करेगी। जाहिर है, इस सारी कवायद का मकसद बाहरी जमीन की देखभाल की आड़ में गुरुद्वारे के प्रबंधन में दखल देना और किसी बहाने उस पर नियंत्रण रखना है।

सवाल है कि आखिर पाकिस्तान को इस तरह का विवादास्पद कदम उठाने की जरूरत ही क्यों पड़ी। क्या वह इस हकीकत से अनजान है कि करतारपुर साहिब सिखों का एक पवित्र धार्मिक स्थल है और उसे लेकर उठाया गया कोई भी विवादास्पद कदम सिख समुदाय को बर्दाश्त नहीं होगा? और वह भी एक ऐसे मौके पर जब करतारपुर गलियारा खुलने को एक साल होने जा रहा है। ऐसे मौके पर तो बेहतर यह होता कि पाकिस्तान करतारपुर साहिब के लिए कोई ऐसा काम या एलान करता, जिसकी भारत और सिख समुदाय दोनों तारीफ करते और सौहार्दपूर्ण माहौल बनता।

सवाल यह है कि जब गुरुद्वारे का प्रबंध देखने के लिए सिखों का अपना निकाय यानी गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी अस्तित्व में है तो फिर सरकार उसमें दखल क्यों दे। जो काम पीएमयू करेगी, क्या उसे कर पाने में गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी सक्षम नहीं है? सभी जगहों पर गुरुद्वारों और उनकी संपत्तियों की देखरेख ये प्रबंधक कमेटियां ही करती हैं। अगर पाकिस्तान सरकार के इस फैसले में कुछ गलत नहीं होता तो सिख समुदाय में रोष क्यों पैदा होता? क्यों भारत सरकार आपत्ति जताती और पाकिस्तान सरकार से इस फैसले को वापस लेने को कहती? इसमें कोई संदेह नहीं कि धीरे-धीरे पाकिस्तान सरकार अल्पसंख्यकों के धार्मिक स्थलों के प्रबंधन के नाम पर उनमें दखल दे रही है, ताकि नए विवाद खड़े हों।

इवैक्यू ट्रस्ट प्रॉपर्टी बोर्ड उन संपत्तियों की देखभाल करता है जो बंटवारे के वक्त हिंदू व सिख छोड़ कर भारत आ गए थे। इस बोर्ड ने करतारपुर साहिब के लिए जो परियोजना प्रबंधन इकाई बनाई, उसमें एक भी सिख सदस्य नहीं रखा गया। यह कदम पाकिस्तान की नीयत को बताता है। हालांकि पाकिस्तान शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी (पीएसजीपीसी) और पाकिस्तान सरकार दोनों ने इस मुद्दे पर सफाई भी दी। इनका कहना है कि करतारपुर साहिब आने वाले श्रद्धालुओं की बढ़ती संख्या को देखते हुए परिसर के बाहर दुकानों, होटलों आदि का निर्माण होना है और यह कवायद उसी के लिए है। पाकिस्तान सरकार ने इसे एक व्यावसायिक मॉडल के रूप में देखने की भी बात कही है। लेकिन पाकिस्तान समय-समय पर जिस तरह से विवाद खड़े करता रहा है, उन्हें देखते हुए कौन उसकी बातों पर विश्वास करेगा!

दरअसल करतारपुर गलियारे के निर्माण से लेकर उसे खोलने तक के दौरान पाकिस्तान सरकार कई ऐसे फैसले करती रही जिनसे विवाद खड़े होते रहे। मसलन, पाकिस्तान सरकार ने करतारपुर जाने वाले हर श्रद्धालु से डेढ़ हजार रुपए का सेवा शुल्क लेने का फैसला अचानक कर डाला। इसी तरह श्रद्धालुओं के पासपोर्ट के मुद्दे पर तब विवाद खड़ा हो गया था, जब प्रधानमंत्री इमरान खान ने कहा था कि करतारपुर आने वालों को पासपोर्ट की जरूरत नहीं होगी, लेकिन अगले ही दिन पाकिस्तान सेना ने कह दिया कि श्रद्धालुओं के लिए पासपोर्ट जरूरी होगा। गलियारा खोलने के मुद्दे पर ही पाकिस्तान दो दशक गुजार दिए थे। इस तरह के विवाद खटास और तनाव ही पैदा करते हैं। लेकिन भारत को लेकर इस पड़ोसी देश का जो रुख है, उसमें उससे उम्मीद भी क्या की जा सकती है!

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