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संपादकीयः फिर किरकिरी

कश्मीर में अब जिस तरह से माहौल बदल रहा है, उससे पाकिस्तान की परेशानियां ज्यादा बढ़ गई हैं। उसे इस बात का अहसास हो चुका है कि अनुच्छेद 370 को खत्म कर दिए जाने के बाद से कश्मीर को हड़पने के उसके इरादों पर पूरी तरह से विराम लग गया है।

सुरक्षा परिषद में बार-बार मुंह की खाने के बाद अब पाकिस्तान और चीन को यह बात अच्छी तरह समझ लेनी चाहिए कि कश्मीर मुद्दे की असलियत दुनिया समझ चुकी है।

संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में बुधवार को कश्मीर मसला उठाने के मामले में चीन और पाकिस्तान को एक बार फिर तगड़ा झटका लगा है। यह कोई पहला मौका नहीं है जब भारत के ये दोनों पड़ोसी देश कश्मीर मामले को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उठाने में नाकाम रहे हैं। पिछले साल पांच अगस्त को जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 को निष्प्रभावी करने के बाद से ही ये दोनों देश भारत के खिलाफ हर स्तर पर अभियान छेड़े हुए हैं। अगस्त 2019 में और फिर इस साल जनवरी में भी इन दोनों देशों ने सुरक्षा परिषद में इस मामले को उठाने की कोशिश की थी, लेकिन तब भी इनके मंसूबे कामयाब नहीं हो पाए थे। सुरक्षा परिषद में बार-बार मुंह की खाने के बाद अब पाकिस्तान और चीन को यह बात अच्छी तरह समझ लेनी चाहिए कि कश्मीर मुद्दे की असलियत दुनिया समझ चुकी है, इसलिए अब इन्हें कहीं से कोई समर्थन नहीं मिलने वाला। बल्कि इस पूरे मामले में दुनिया भारत की सच्चाई पर भरोसा कर रही है। अगर भारत कहीं गलत होता तो क्या दुनिया के दूसरे देश चुप बैठते! भारत हमेशा से कहता आया है कि जम्मू-कश्मीर उसका अभिन्न हिस्सा है।

कश्मीर में अब जिस तरह से माहौल बदल रहा है, उससे पाकिस्तान की परेशानियां ज्यादा बढ़ गई हैं। उसे इस बात का अहसास हो चुका है कि अनुच्छेद 370 को खत्म कर दिए जाने के बाद से कश्मीर को हड़पने के उसके इरादों पर पूरी तरह से विराम लग गया है। पाकिस्तान इस बात से भी डरा हुआ है कि जिस पाक अधिकृत कश्मीर पर वह कब्जा करके बैठा है, वह भी कहीं उसके हाथ से न निकल जाए। इसी हताशा में वह घाटी में आतंकवाद फैलाने की नित नई साजिशें रच रहा है। उधर, चीन की परेशानी लद्दाख को लेकर है। जम्मू-कश्मीर और लद्दाख को केंद्र शासित प्रदेश बना दिए जाने से चीन भी बौखलाया हुआ है। इसीलिए वह पाकिस्तान को आगे कर सुरक्षा परिषद में बार-बार कश्मीर मुद्दा उछलवा रहा है। इस बार भी कश्मीर पर बैठक चीन के प्रस्ताव पर ही बुलाई गई। लेकिन सुरक्षा परिषद के स्थायी सदस्यों- अमेरिका, ब्रिटेन, रूस और फ्रांस ने उसका साथ नहीं दिया, बल्कि भारत का समर्थन करते हुए यह कहा कि कश्मीर भारत और पाकिस्तान का आपसी मामला है और इसे शिमला समझौते के तहत ही सुलझाया जाना चाहिए। इसमें कोई संदेह नहीं कि इस वक्त चीन का भारत के प्रति जो हमलावर रुख बना हुआ है और लद्दाख क्षेत्र में भारत-चीन सीमा पर जिस तरह का तनाव जारी है, इसलिए वह हर तरह से भारत को घेरने में लगा है और इसमें खुल कर पाकिस्तान का इस्तेमाल कर रहा है।

दुख की बात तो यह है कि अब तक पाकिस्तान का हर हुक्मरान कश्मीर मसले को बातचीत और शांति से हल करने की बात कहता तो आया है, लेकिन बर्ताव में सब ठीक उलट रहे हैं। जब-जब किसी वार्ता की पहल हुई है, तभी पाकिस्तान ने करगिल युद्ध जैसे जख्म देकर उन पर पानी फेर दिया। उसे जहां और जब मौका मिला, बिना किसी प्रसंग के भी कश्मीर मसले को उठा कर सहानुभूति बटोरनी की कोशिश की। लेकिन इस तरह की चालें उसी पर उल्टी पड़ जाती हैं। इस्लामिक देशों के संगठन (ओआइसी) की बैठक तक में उसे कश्मीर मुद्दा नहीं उठाने दिया गया। अगर बार-बार पाकिस्तान को कश्मीर के मामले में दुनिया के देशों और सुरक्षा परिषद का समर्थन नहीं मिल रहा है तो यही उसकी सबसे बड़ी कूटनीतिक हार है। उसे इसके नीहितार्थ समझने चाहिए।

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